Test – दुबई की गर्म हवा में भी जोनाथन ट्रॉट की बातें ठंडी, सधी हुई और बड़े वर्षों के क्रिकेट अनुभव से लिपटी हुई लगीं। अफगानिस्तान के मौजूदा मुख्य कोच और इंग्लैंड के पूर्व भरोसेमंद बल्लेबाज ने मंगलवार को एक ऐसी बात कही, जिस पर क्रिकेट जगत अक्सर बहस तो करता है—लेकिन ठीक इस साफगोई के साथ शायद ही कभी सुनता है।
“टेस्ट क्रिकेट को एक ही शैली में मत बांधिए। इसकी खूबसूरती विविधता में है।”
ट्रॉट का ताज़ा बयान भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और श्रीलंका जैसे देशों में चल रही “पिच फिलॉसफी” की चर्चा के बीच आया—खासकर उस भारतीय श्रृंखला के बाद, जो दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ स्पिन मददगार पिचों पर उल्टा पड़ गई।
भारत की स्पिन पिचों पर ट्रॉट का समर्थन—“इसमें गलत क्या है?”
भारत ने हाल ही में साउथ अफ्रीका के खिलाफ दो मैचों की टेस्ट सीरीज स्पिन-अनुकूल विकेट तैयार कर खेली।
इतिहास कहता है—अधिकतर टीमों को यही भारत की ताकत तोड़ती है।
लेकिन इस बार हालात बदल गए।
स्पिनरों की मददगार पिचों पर साउथ अफ्रीका ने दोनों टेस्ट भारत से छीन लिए।
इसके बावजूद ट्रॉट का कहना था:
“जब आप भारत जाते हैं, तो पता होता है गेंद स्पिन करेगी…
श्रीलंका में भी यही होगा…
ऑस्ट्रेलिया जाते हैं तो गेंद उछलेगी—हर जगह अपनी पहचान है।”
यानी—भारत यदि टर्निंग विकेट बनाता है, तो वह उसकी क्रिकेटिंग संस्कृति का हिस्सा है, अपराध नहीं।
यह बयान BCCI की पिच नीतियों पर अक्सर आने वाली आलोचनाओं के ठीक उलट है।
क्रिकेट के अनिवार्य नियमों ( में भी यह साफ है कि पिचें प्रत्येक देश की उपलब्ध परिस्थितियों और स्थानीय शैली को प्रतिबिंबित कर सकती हैं।
ट्रॉट भी इसी विविधता को “टेस्ट क्रिकेट की ताकत” बताते हैं।
शैली का संघर्ष नहीं, विविधता का उत्सव—ट्रॉट का बड़ा क्रिकेट दर्शन
ट्रॉट ने कहा कि क्रिकेट की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह “एक जैसी नहीं” है।
कोई बैजबॉल खेले, कोई पारंपरिक डिफेंस—ये दोनों अस्तित्व में रह सकते हैं।
उन्होंने इस साल इंग्लैंड में भारत के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ हुई जोरदार टेस्ट सीरीज का जिक्र किया और कहा:
“देखिए कि शुभमन गिल कैसे लीड कर रहे थे और बेन स्टोक्स कैसे…
दोनों की शैली अलग, दोनों सफल।”
यह वह सीरीज थी जिसने पूरे क्रिकेट जगत को यह एहसास कराया कि टेस्ट क्रिकेट आज भी सबसे आकर्षक प्रारूप बन सकता है, अगर टीमों को अपनी शैली चुनने की स्वतंत्रता मिले।
दो कप्तान, दो तरीके – एक उत्कृष्ट मुकाबला
| टीम | कप्तान | शैली |
|---|---|---|
| भारत | शुभमन गिल | संतुलित आक्रामकता + धैर्य |
| इंग्लैंड | बेन स्टोक्स | बैजबॉल—अटूट आक्रामक दृष्टिकोण |
ट्रॉट का तर्क यह है—
बस एक ही तरीका “सही टेस्ट क्रिकेट” नहीं हो सकता।
एक मैच पाँच दिन तक खींच जाए या तीन दिन में खत्म हो जाए—दोनों ही खेल का हिस्सा हैं।
“कभी हम टेस्ट को उबाऊ कहते थे… अब कहते हैं बहुत तेज़ है”
ट्रॉट ने एक दिलचस्प याद ताजा की:
“एक समय था जब लोग कहते थे टेस्ट क्रिकेट बोरिंग है क्योंकि मैच ड्रॉ बहुत होते हैं।
अब हम कहते हैं कि टेस्ट क्रिकेट जल्दी खत्म हो जाता है… बहुत जीत-हार होती है।”
यह पंक्ति बताती है कि खेल को लेकर धारणा हमेशा बदलती रहती है।
कभी बैजबॉल की आलोचना होती है, कभी उसकी तारीफ।
कभी पिचें फ्लैट होने पर शिकायत, कभी स्पिन होने पर।
ट्रॉट का संदेश है—अत्यधिक प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए।
टेस्ट और ODI को एक सा मत बनाइए—क्रिकेट की पहचान बचाइए
उनका एक और महत्वपूर्ण कहना था:
“हमें सतर्क रहना होगा कि टेस्ट और वनडे क्रिकेट को एक ही दायरे में न रख दें।
हर टीम का इन प्रारूपों में खेलने का तरीका अलग है—इसी से खेल दिलचस्प बनता है।”
यानी सफेद गेंद की तेज़, आक्रामक मानसिकता को लाल गेंद के खेल पर मजबूर करना सही नहीं।
टेस्ट की गहराई, धैर्य और परिस्थितियों की चुनौती उसकी आत्मा है।
इस बात में वाजिब तर्क है—ICC की फॉर्मेट स्पेसिफिक गाइडलाइंस भी टेस्ट को “conditions-driven, strategy-heavy cricket” की जगह पर रखती हैं, जबकि ODI/T20 की मांग अलग है।
ट्रॉट की बातों का बड़ा मतलब—आईसीसी और क्रिकेट की दिशा पर असर?
यह बयान ऐसे समय में आया है जब:
- इंग्लैंड बैजबॉल को आगे बढ़ा रहा है
- भारत घरेलू पिचों को लेकर आलोचना झेल रहा है
- ऑस्ट्रेलिया तेज़-उछाल वाली पिचों पर टिका हुआ है
- श्रीलंका और पाकिस्तान स्पिनिंग टेरिट्री को फिर से मजबूत कर रहे हैं
ट्रॉट का संदेश है:
सब अपने रास्ते पर चलें—टेस्ट क्रिकेट किसी एक फार्मूले से कभी महान नहीं बना।















