Conrad – भारत–दक्षिण अफ्रीका सीरीज के बीच एक छोटी-सी लाइन ने जितना शोर मचाया, उतना शायद किसी शॉट, किसी विकेट या किसी रिकॉर्ड ने नहीं मचाया। मामला था—साउथ अफ्रीका के हेड कोच शुकरी कोनराड के ‘ग्रोवेल’ कमेंट का।
एक ऐसा शब्द, जो क्रिकेट में सिर्फ एक बार पहले इतिहास बदल चुका है—और जिसकी गूंज आज भी संवेदनशील है।
कोनराड ने अब इस पर चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने माना कि उनसे शब्द चयन में गलती हुई, लेकिन बात साफ कर दी—माफी नहीं मांगेंगे, क्योंकि उनका उद्देश्य अपमान का नहीं, रणनीति का था।
यह बयान भी कोनराड की वही साफगोई लेकर आया, जिसके लिए टीम मैनेजमेंट उन्हें जानती है, और जिसके कारण उनके शब्द अक्सर शोर भी मचा देते हैं।
कोनराड—“इरादा गलत नहीं था, लेकिन बेहतर शब्द चुन सकता था”
विशाखापट्टनम में तीसरे वनडे के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोनराड ने कहा:
“मेरा इरादा कभी भी किसी के प्रति बुराई करने या घमंडी होने का नहीं था। सोचने पर लगा कि मैं इससे बेहतर शब्द चुन सकता था। इसने लोगों को अपने हिसाब से मतलब निकालने का मौका दिया। मेरा मतलब सिर्फ यह था कि भारत को ज्यादा देर मैदान पर रखकर मैच उनके लिए मुश्किल बनाना।”
वहां खड़े पत्रकारों ने देखा—टोन में पछतावा था, लेकिन माफी वाला समर्पण नहीं।
कोनराड ने साफ कहा कि उनकी टिप्पणी कॉन्टेक्स्ट से बाहर ले ली गई और उसे एक ऐतिहासिक, नस्लीय शब्द के अर्थों के साथ जोड़ दिया गया।
असल बयान क्या था?
25 नवंबर, गुवाहाटी टेस्ट की चौथी शाम—
जब पूछा गया कि 549 रन की विशाल बढ़त लेने से पहले दक्षिण अफ्रीका ने इतनी लंबी बल्लेबाज़ी क्यों की?
कोनराड ने कहा था:
“हम चाहते थे कि भारतीय खिलाड़ी मैदान पर ज्यादा समय बिताएं… उन्हें पूरी तरह मैच से बाहर कर दें।”
और उसी संदर्भ में एक शब्द slipped out—grovel।
यह वही शब्द है जिसने 1976 में टोनी ग्रेग के बयान के बाद वेस्टइंडीज–इंग्लैंड सीरीज को आग लगा दी थी।
वेस्टइंडीज उस टिप्पणी से इतना नाराज़ हुआ कि सीरीज 3-0 से जीत ली—और वह वाकई क्रिकेट इतिहास की सबसे प्रतीकात्मक प्रतिशोध कहानियों में से एक थी।
कोनराड ने स्वीकार किया—
“47 शब्द सही थे… एक शब्द गलत था।”
क्यों हुआ विवाद?
‘Grovel’ शब्द सिर्फ एक सामान्य क्रिया नहीं।
यह उपनिवेशवाद, नस्लीय दासता, और अपमान से जुड़ा ऐतिहासिक बोझ लेकर चलता है।
क्रिकेट के इतिहास में यह हर बार वहीं भावनाएँ जगाता है—शक्ति, अपमान, प्रतिरोध।
भारत जैसे टीम—जो अब खेल की सुपरपावर है—के संदर्भ में यह शब्द सहज ही गलत अर्थ पैदा कर देता है।
“माफी क्यों नहीं?”—कोनराड का तर्क
उनकी बात में दो परतें थीं:
- इरादा गलत नहीं—उनका कहना था यह सिर्फ मैदान पर दबाव बनाने की रणनीति थी।
- शब्द को कॉन्टेक्स्ट से बाहर लिया गया—इसलिए वह खेद जताते हैं, लेकिन माफी नहीं।
वह बोले:
“अब मुझे यह ध्यान रखना होगा कि कौन सा शब्द इस्तेमाल करूं, क्योंकि कोई भी कॉन्टेक्स्ट जोड़ सकता है।”
एक तरह से यह बयान मीडिया की व्याख्या पर भी कटाक्ष था।
“हो सकता है इससे सीरीज और मज़ेदार हुई हो”
सबसे दिलचस्प लाइन यह थी—कोनराड ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा:
“यह सच में दुख की बात है… लेकिन शायद इससे वनडे सीरीज और मजेदार हुई। अब T20 सीरीज और रोमांचक होगी।”
यानी विवाद को पब्लिक एनर्जी मानकर वह आगे बढ़ चुके हैं।
भारत की जीत और SA की मानसिकता
तीसरे वनडे में दक्षिण अफ्रीका को 9 विकेट से हार मिली।
भारत के बल्लेबाज़ी प्रदर्शन ने बता दिया कि मैदान पर कोई भी ‘ग्रोवेल’ होने वाला नहीं—
बल्कि यह टीम अपने विरोधी को तकनीक, संयम और आक्रामकता से हराती है, न कि शब्दों के जवाब में।
SA टीम ने हालांकि सीरीज में कई युवा चेहरों को आज़माया और उनकी ग्रोथ बावुमा ने भी स्वीकार की—लेकिन कोनराड का बयान इस सीरीज का कथानक मोड़ निश्चित रूप से बन गया।















