Test – कपटाउन से जोहानिसबर्ग तक भारतीय टीम भले ही दो टेस्ट हारी हो, लेकिन बहस कहीं ज़्यादा दूर तक जा पहुंची—क्या भारत को फॉर्मेट-वार अलग कोच रखने चाहिए?
पूर्व कप्तान कपिल देव ने इस सवाल पर साफ और बेहद सधा हुआ जवाब दिया है:
“जो भारतीय क्रिकेट के लिए अच्छा है, वही होना चाहिए—अलग कोच की जरूरत है या नहीं, इसका जवाब आसान नहीं है।”
कपिल के बयान में एक दिलचस्प बात थी—उन्होंने न तो इस विचार का सीधा समर्थन किया, न विरोध। बल्कि वे इस बहस को प्रैक्टिकल फ्रेम में रखते हैं—परिणाम देखें, ज़रूरत समझें, फिर फैसला करें।
क्या भारत को फॉर्मेट-आधारित कोचिंग की ज़रूरत है? कपिल ने क्या कहा
भारत को घर में दक्षिण अफ्रीका से 0–2 टेस्ट हार झेलनी पड़ी, जिसके बाद कई विशेषज्ञों ने कहा कि लाल गेंद और सफेद गेंद की जटिलताएँ अब इतनी अलग हैं कि दोनों के लिए अलग हेड कोच की जरूरत हो सकती है।
सवाल कपिल देव से पूछा गया—और उनका जवाब था:
“मुझे नहीं पता। इसे बहुत सोचने की जरूरत है।
जो भी भारतीय क्रिकेट के लिए अच्छा है, वही अपनाना चाहिए।”
यानी कपिल किसी फैशन ट्रेंड की तरह “मल्टी-कोच” मॉडल पर कूदने के पक्ष में नहीं हैं।
वे साफ कहते हैं—भारत का सेटअप अलग है, और फैसला भारतीय संदर्भ में होना चाहिए।
फिलहाल टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर हैं।
“एथलीट बनना आज मुश्किल है?” — कपिल का दो टूक जवाब
सोशल मीडिया युग में प्रदर्शन का दबाव बढ़ा है—यह तर्क आजकल हर जगह सुनाई देता है।
लेकिन कपिल देव इस नैरेटिव से सहमत नहीं:
“नहीं… खेल हमेशा मुश्किल था, अब भी उतना ही है।
तब भी आसान था, अब भी आसान है।
आपकी सोच सबसे ज्यादा मायने रखती है।”
यह बयान साफ दर्शाता है कि कपिल सफलता को तकनीक या माहौल से ज्यादा मानसिकता से जोड़ते हैं।
IPL vs Team India — यह बहस भी कपिल से छूटी नहीं
फ्रैंचाइज़ी क्रिकेट के उभार के साथ यह बड़ा सवाल बन चुका है:
क्या खिलाड़ी अब देश से ज्यादा लीग को प्राथमिकता देने लगे हैं?
कपिल देव ने इसे बड़े संतुलित ढंग से रखा:
“हर किसी को पैसा पसंद है, कुछ खिलाड़ियों को लगता है लीग जरूरी है।
लेकिन मेरी सोच… भारत के लिए खेलना IPL से कहीं ज्यादा अहम है।”
यह वही स्टैंड है जो उन्होंने हाल ही में ‘72 द लीग’ गोल्फ इवेंट में भी दोहराया था—
देश पहले, बिज़नेस बाद में।
क्या कपिल किसी खास फॉर्मेट को पसंद करते हैं?
उनका जवाब जितना सरल था, उतना ही खूबसूरत भी:
“मुझे क्रिकेट पसंद है—दो गेंदों का हो या 100 ओवर का।
क्रिकेट तो क्रिकेट है। जैसे गोल्फ—फॉर्मेट बदले तो क्या?”
यानी कपिल खेल को उसके मूल रूप में देखने वाले खिलाड़ी हैं—फॉर्मेट उन्हें बाँध नहीं सकता।
और विराट-रोहित पर एक मज़ाकिया तंज:
“उन्हें शुभकामनाएँ… गोल्फ भी खेलना चाहिए!”
कपिल के बयान की तीन बड़ी परतें
1) अलग कोच—भारत बिना वजह प्रयोग नहीं करे
वे मानते हैं कि इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया का मॉडल भारत पर फिट नहीं बैठता।
2) मानसिकता > सिस्टम
खेल कठिन या आसान नहीं हुआ—खिलाड़ी की सोच उसका असली हथियार है।
3) राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व सर्वोच्च
IPL की चमक हो सकती है, लेकिन टीम इंडिया की जर्सी की गरिमा उसके ऊपर नहीं जा सकती।















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