Kohli – जब भी विराट कोहली की कप्तानी की बात होती है, बहस दो हिस्सों में टूट जाती है। एक तरफ आंकड़े होते हैं, दूसरी तरफ ट्रॉफियां। और ठीक इसी दरार में एक बार फिर आग डाल दी है—हरभजन सिंह, टॉम मूडी और एबी डिविलियर्स ने।
मंच था जियोहॉटस्टार का Rise of the Champions शो, संदर्भ था T20 वर्ल्ड कप 2026, लेकिन मुद्दा निकल आया विराट के उस दौर का, जिसे कुछ लोग सुनहरा कहते हैं और कुछ… अधूरा।
“इतनी मजबूत टीम थी, ट्रॉफियां ज्यादा आनी चाहिए थीं” – हरभजन सिंह
पूर्व भारतीय ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने बिना लाग-लपेट के कहा कि विराट कोहली के पास जिस तरह की व्हाइट बॉल टीम थी, उसे देखते हुए नतीजे और बेहतर होने चाहिए थे।
हरभजन का मानना है कि विराट टेस्ट क्रिकेट में शानदार कप्तान रहे, लेकिन सीमित ओवरों में वही असर ट्रॉफियों में नहीं दिखा।
उनके शब्दों में,
“उस टीम के साथ तीन-चार ICC ट्रॉफी जीती जा सकती थीं। अगर नहीं जीते, तो जरूर कुछ कारण रहे होंगे। लेकिन मेरे हिसाब से टीम बहुत अच्छी थी।”
यह बयान हल्का नहीं है। यह उस दौर पर सीधा सवाल है, जिसमें भारत के पास रोहित शर्मा, शिखर धवन, जसप्रीत बुमराह, हार्दिक पंड्या, एमएस धोनी जैसे खिलाड़ी थे।
बड़े टूर्नामेंट, बड़ी हारें
विराट कोहली की कप्तानी का सबसे बड़ा आरोप यही रहा है—नॉकआउट में फिसलन।
एक नज़र डालते हैं उन अहम मौकों पर:
| टूर्नामेंट | नतीजा |
|---|---|
| चैंपियंस ट्रॉफी 2017 | फाइनल में पाकिस्तान से 180 रन की हार |
| वनडे वर्ल्ड कप 2019 | सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार |
| T20 वर्ल्ड कप 2021 | ग्रुप स्टेज में ही बाहर |
इन तीनों टूर्नामेंट्स में भारत फेवरेट माना जा रहा था। खासकर 2019 वर्ल्ड कप में, जहां लीग स्टेज में टीम ने दबदबा बनाया था। लेकिन सेमीफाइनल की एक खराब सुबह ने कहानी पलट दी।
“विराट-शास्त्री के दौर में सिलेक्शन मेरी चिंता थी” – संजय मांजरेकर
हरभजन की बात को आगे बढ़ाया संजय मांजरेकर ने। उन्होंने सीधे तौर पर कोहली-शास्त्री युग के टीम चयन पर सवाल उठाए।
मांजरेकर ने कहा,
“रवि और विराट के अंडर टीम सिलेक्शन हमेशा मेरी सबसे बड़ी चिंता रही।”
यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि आलोचना सिर्फ कप्तान पर नहीं, बल्कि पूरे मैनेजमेंट मॉडल पर जाती है। यानी कप्तानी फैसले, टीम कॉम्बिनेशन और प्लानिंग—सब कटघरे में।
टॉम मूडी: “उम्मीदें बहुत थीं, अंत में निराशा मिली”
ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज कोच टॉम मूडी, जो खुद T20 वर्ल्ड कप जीत चुके हैं, उन्होंने विराट के कप्तानी दौर को “डिसअपॉइंटिंग” बताया।
मूडी का कहना था,
“विराट कोहली का दौर उम्मीदों से भरा था, लेकिन आखिर में निराशा ही हाथ लगी।”
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मूडी किसी भारतीय पैनल का हिस्सा नहीं हैं। यह बाहर से आई हुई, न्यूट्रल एनालिसिस है—जो बहस को और गहरा बनाती है।
एबी डिविलियर्स का पलटवार: “कप्तान को सिर्फ वर्ल्ड कप से मत आंकिए”
जहां आलोचना तेज़ हो रही थी, वहीं विराट के सबसे भरोसेमंद दोस्त एबी डिविलियर्स उनके बचाव में उतरे।
एबी ने कहा,
“मुझे चिढ़ होती है जब लोग कप्तान को सिर्फ इस आधार पर जज करते हैं कि उसने वर्ल्ड कप जीता या नहीं। यह कहना कि ‘वह बेकार है क्योंकि उसने वर्ल्ड कप नहीं जीता’—गलत है।”
यह बयान उस सोच पर सवाल उठाता है, जिसमें कप्तानी को सिर्फ ट्रॉफी से तौला जाता है। एबी का इशारा साफ था—लीडरशिप, कल्चर और टीम बिल्डिंग भी मायने रखती है।
आंकड़े क्या कहते हैं? विराट की कप्तानी का न्यूमेरिकल सच
भावनाओं से हटकर अगर सिर्फ आंकड़ों पर जाएं, तो विराट कोहली की कप्तानी इतनी कमजोर भी नहीं लगती।
T20I कप्तानी
- मैच: 50
- जीत: 30
- हार: 16
- टाई: 2
- बेनतीजा: 2
- जीत प्रतिशत: 60%
ODI कप्तानी
- मैच: 95
- जीत: 65
- हार: 27
- टाई: 1
- बेनतीजा: 2
- जीत प्रतिशत: 68% के करीब
इन नंबरों के साथ किसी भी कप्तान को “फेल” कहना आसान नहीं है। लेकिन फिर वही सवाल लौट आता है—ICC ट्रॉफी कहां है?
क्या ट्रॉफी ही सब कुछ है?
भारतीय क्रिकेट में कप्तान को आंकने का पैमाना हमेशा से सख्त रहा है।
- सौरव गांगुली – ट्रॉफी कम, लेकिन टीम बदली
- धोनी – ट्रॉफी भी, कल्चर भी
- विराट – टीम मजबूत, लेकिन ट्रॉफी नहीं
यही वजह है कि विराट का केस सबसे ज्यादा जटिल है। उन्होंने फिटनेस कल्चर बदला, तेज़ क्रिकेट को बढ़ावा दिया, लेकिन ICC इवेंट्स में आखिरी स्टेप चूक गए।
एरोन फिंच का नजरिया: “रेप्युटेशन भी बोझ बन जाता है”
इस चर्चा की शुरुआत एरोन फिंच के बयान से हुई थी। उन्होंने कहा था कि भारतीय टीम को देखकर लोग मान लेते हैं कि वे जीतेंगे ही।
“यह एक शानदार टीम है, लेकिन उस रेप्युटेशन का भी अपना दबाव होता है।”
यानी कभी-कभी फेवरेट होना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।
विराट की कप्तानी: असफल या अधूरी?
तो सवाल यही है—विराट कोहली की व्हाइट बॉल कप्तानी को क्या कहा जाए?
- असफल? शायद नहीं
- महान? शायद अधूरी
- ट्रॉफीलेस? हां
- बेअसर? बिल्कुल नहीं
विराट का दौर उस लाइन पर आकर रुक जाता है, जहां सब कुछ था—बस आखिरी मोहर नहीं लगी।



















