Yash : जमानत खारिज गिरफ्तारी की आशंका – यश दयाल केस में नया मोड़

Atul Kumar
Published On:
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Yash – जयपुर की एक अदालत से आया यह आदेश सिर्फ एक जमानत याचिका का खारिज होना नहीं है—यह संकेत है कि मामला अब कानूनी तौर पर गंभीर मोड़ में प्रवेश कर चुका है।

आईपीएल टीम रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के तेज़ गेंदबाज़ यश दयाल के खिलाफ दर्ज मामले में बुधवार को पॉक्सो विशेष न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। इसके साथ ही उनकी गिरफ्तारी की आशंका वास्तविक हो गई है, अनुमान नहीं।

अदालत की टिप्पणी सीधी और कड़ी थी—प्रारंभिक जांच में ऐसा नहीं लगता कि आरोपी को झूठे आरोपों में फंसाया गया है।

अदालत का आदेश: “अग्रिम जमानत उचित नहीं”

जयपुर स्थित पॉक्सो अधिनियम के विशेष न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अब तक सामने आए साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं। ऐसे में अग्रिम जमानत देना न्यायोचित नहीं होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • पीड़िता नाबालिग थी
  • आरोप गंभीर प्रकृति के हैं
  • जांच अभी प्रारंभिक चरण में है
  • आरोपी को गिरफ्तारी से संरक्षण देना गलत संदेश देगा

कानूनी भाषा में यह आदेश साफ कहता है—मामला सिर्फ आरोपों तक सीमित नहीं रहा।

गिरफ्तारी का रास्ता खुला

इस याचिका के खारिज होने का एक अहम मतलब यह भी है कि दिल्ली या जयपुर उच्च न्यायालय की ओर से गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं है। यानी अब पुलिस:

  • आगे की पूछताछ कर सकती है
  • आरोपी को हिरासत में ले सकती है
  • चार्जशीट की प्रक्रिया तेज़ कर सकती है

कानून के जानकारों के मुताबिक, अग्रिम जमानत खारिज होना अक्सर जांच एजेंसी को अधिक स्वतंत्रता देता है।

क्या हैं आरोप?

मामला 23 जुलाई 2025 को जयपुर के सांगानेर सदर थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था।

पीड़िता का आरोप है कि:

  • यश दयाल ने क्रिकेट करियर में मदद का झांसा दिया
  • भावनात्मक ब्लैकमेल किया
  • दो साल से अधिक समय तक दुष्कर्म किया

अदालत ने अपने आदेश में माना कि आरोप केवल बयान आधारित नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से जुड़े हैं।

जांच में क्या-क्या शामिल?

पुलिस जांच अब सिर्फ आरोप और जवाब तक सीमित नहीं है। केस डायरी में शामिल हैं:

  • दोनों के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR)
  • चैट मैसेज और सोशल मीडिया संवाद
  • फोटो और वीडियो रिकॉर्ड
  • होटल में ठहरने के रजिस्ट्रेशन और बुकिंग डेटा

अदालत ने माना कि इन साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच अभी जारी है, और इस स्तर पर आरोपी को अग्रिम राहत देना उचित नहीं।

नाबालिग होने का पहलू: सबसे गंभीर बिंदु

इस केस में सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू है—पीड़िता की उम्र।

अदालत ने माना कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। इसी आधार पर मामला POCSO Act के तहत आता है, जहां कानून:

  • आरोपी के प्रति बेहद सख्त है
  • जमानत में अत्यधिक सावधानी बरतता है
  • पीड़ित के अधिकारों को प्राथमिकता देता है

यही वजह है कि अदालत ने अपने आदेश में कोई नरमी नहीं दिखाई।

यश दयाल का पक्ष: “झूठे आरोप”

यश दयाल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि:

  • सभी आरोप झूठे और मनगढ़ंत हैं
  • उन्हें फंसाने के इरादे से मामला दर्ज कराया गया
  • वह जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं

लेकिन अदालत ने कहा कि इस स्तर पर आरोपी की मंशा नहीं, बल्कि साक्ष्यों की दिशा देखी जाती है।

गाजियाबाद का दूसरा मामला भी चर्चा में

यह मामला यहीं खत्म नहीं होता।

इससे पहले 6 जुलाई 2025 को गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाना क्षेत्र में भी एक महिला ने यश दयाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी।

यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज की गई थी।

इस मामले में:

  • यश दयाल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया
  • एफआईआर रद्द करने की मांग की
  • राज्य सरकार, एसएचओ और पीड़िता को पक्षकार बनाया गया

यानि यश दयाल इस समय दो अलग-अलग कानूनी मोर्चों पर जूझ रहे हैं।

क्रिकेट और कानून: अलग-अलग मैदान

यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि मैदान पर पहचान और कानून की नजर में स्थिति—दो अलग बातें हैं।

आईपीएल जैसे मंच पर खेलने वाला खिलाड़ी होना:

  • न अपराध का प्रमाण है
  • न ही संरक्षण की गारंटी

कानून हर मामले में तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर चलता है—स्टारडम के आधार पर नहीं।

बीसीसीआई या आईपीएल की प्रतिक्रिया?

अब तक बीसीसीआई या आईपीएल फ्रेंचाइज़ी आरसीबी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

आमतौर पर ऐसे मामलों में:

  • जांच पूरी होने तक बोर्ड सार्वजनिक टिप्पणी से बचता है
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई बाद के चरण में तय होती है

बीसीसीआई की आचार संहिता और दिशानिर्देश ऐसे मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं।

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