KL Rahul – महेंद्र सिंह धोनी के रिटायरमेंट के बाद भारतीय क्रिकेट में एक खालीपन हमेशा महसूस किया गया। ऐसा खिलाड़ी, जो दबाव में घबराए नहीं। जो आख़िरी ओवर तक टिके। और जो मैच को अधूरा छोड़कर पवेलियन न लौटे। सालों तक फैंस ने उस नाम को ढूंढा—कभी हार्दिक पांड्या में, कभी रिंकू सिंह में। लेकिन अगर शोर से हटकर आंकड़ों और गेम-अवेयरनेस को देखा जाए, तो एक नाम चुपचाप उस जगह को भरता दिख रहा है—केएल राहुल।
बिना ज्यादा हाइप, बिना फिनिशिंग सिक्स के शोर के—राहुल ने खुद को एक ऐसे फिनिशर के तौर पर ढाल लिया है, जिसकी पहचान धोनी की तरह मैच खत्म करके लौटना है।
फिनिशर की असली पहचान: नाबाद रहना
एमएस धोनी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ छक्के नहीं थे। उनकी असली पहचान थी—
क्रीज़ पर आख़िर तक टिके रहना।
आंकड़े इसे पूरी तरह साबित करते हैं।
- एमएस धोनी:
- सफल रन चेज में 75 पारियां
- 47 बार नाबाद
यानी जब भारत ने लक्ष्य का पीछा करते हुए मैच जीता, धोनी अक्सर वहीं खड़े थे।
अब केएल राहुल को देखिए।
- केएल राहुल:
- सफल रन चेज में 25 पारियां
- 13 बार नाबाद
यानी 52% मौकों पर, जब भारत ने चेज़ करते हुए जीत हासिल की—राहुल ने खुद मैच फिनिश किया।
यह आंकड़ा शोर नहीं करता, लेकिन बहुत कुछ कह जाता है।
धोनी जैसा रोल, राहुल की स्टाइल
राहुल की बल्लेबाज़ी को अगर एक लाइन में समझना हो, तो वह यह है—
पहले मैच बचाओ, फिर मैच खत्म करो।
यह वही सोच है, जो धोनी के डीएनए में थी।
राहुल:
- शुरुआत में जोखिम नहीं लेते
- विकेट गिरने से रोकते हैं
- पार्टनरशिप बनाते हैं
- और फिर सही वक्त पर गियर बदलते हैं
वह आख़िरी ओवरों में आकर सिर्फ हिटिंग नहीं करते।
वह उससे पहले मैच को ऐसी स्थिति में ले जाते हैं कि चमत्कार की जरूरत ही न पड़े।
यही वजह है कि उन्हें एक “कनेक्टर” कहा जा सकता है—
टॉप ऑर्डर और फिनिश के बीच की सबसे अहम कड़ी।
आज के आक्रामक क्रिकेट में राहुल क्यों ज़रूरी हैं?
आज का क्रिकेट तेज है।
हर कोई 20 गेंद में 40 रन चाहता है।
हर कोई “इंपैक्ट” ढूंढता है।
लेकिन हर मैच ऐसे नहीं जीते जाते।
कुछ मैच ऐसे होते हैं जहां:
- रन रेट काबू में रखना होता है
- विकेट बचाने होते हैं
- और विरोधी को गलती करने पर मजबूर करना होता है
ऐसे मैचों में केएल राहुल की वैल्यू दोगुनी हो जाती है।
हार्दिक और रिंकू से तुलना क्यों अलग है?
यह साफ कर देना जरूरी है—
हार्दिक पांड्या और रिंकू सिंह बेहतरीन फिनिशर हैं, लेकिन उनका रोल अलग है।
रिंकू सिंह
- लिमिटेड ओवर क्रिकेट में हिटर
- वनडे में अब तक मौके कम
- विकेट बचाकर लंबा खेलने का अनुभव सीमित
हार्दिक पांड्या
- आक्रामक बल्लेबाज़
- जल्दी मैच खत्म करने की सोच
- कई बार मुश्किल परिस्थिति में जोखिम ज्यादा
इसके उलट केएल राहुल:
- विकेट को कीमत देते हैं
- गलत शॉट सिलेक्शन कम
- मुश्किल सिचुएशन में धैर्य रखते हैं
यही वजह है कि वनडे क्रिकेट में राहुल की भूमिका धोनी से ज्यादा मेल खाती है।
धोनी की नकल नहीं, विरासत की वापसी
केएल राहुल धोनी बनने की कोशिश नहीं कर रहे।
वह वही हेलिकॉप्टर शॉट नहीं खेलते।
वह वैसी कप्तानी नहीं करते।
लेकिन वह वापस ला रहे हैं—
- अनुशासन
- भरोसा
- और वह एहसास कि “मैच कंट्रोल में है”
जब राहुल क्रीज़ पर होते हैं, तो ड्रेसिंग रूम को सुकून मिलता है।
और यह सुकून वही है, जो कभी धोनी दिया करते थे।















