ICC – सोमवार को आईसीसी के एक बयान ने टी20 वर्ल्ड कप 2026 से जुड़े सबसे संवेदनशील विवाद पर अचानक ब्रेक लगा दिया। भारत में मैच खेलने से इनकार करने के बावजूद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड पर कोई सज़ा नहीं। न जुर्माना, न अंक कटौती, न कोई प्रशासनिक कार्रवाई। जिस फैसले का डर महीनों से बीसीबी को सताए हुए था, उस पर आईसीसी ने फिलहाल राहत की मुहर लगा दी है।
लेकिन इस फैसले के पीछे की कहानी सीधी नहीं है। इसमें पाकिस्तान की भूमिका है, कूटनीतिक संतुलन है और आईसीसी की वह नीति भी, जिसमें सज़ा से ज़्यादा “मैनेजमेंट” को तरजीह दी जा रही है।
बांग्लादेश को राहत, ICC ने सज़ा से किया इनकार
आईसीसी ने अपने आधिकारिक बयान में साफ कहा कि भारत में टी20 वर्ल्ड कप के मैच खेलने से इनकार के बावजूद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड पर किसी तरह का आर्थिक, खेल संबंधी या प्रशासनिक दंड नहीं लगाया जाएगा।
आईसीसी के मुताबिक, यह फैसला बीसीबी और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड दोनों से बातचीत के बाद लिया गया। बयान में यह भी जोड़ा गया कि मौजूदा नियमों के तहत बीसीबी का विवाद निपटान समिति के पास जाने का अधिकार बना रहेगा।
यह लाइन अपने आप में अहम है। इसका मतलब साफ है—आईसीसी ने दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं किया है, लेकिन फिलहाल टकराव से बचने का रास्ता चुना है।
पाकिस्तान की एंट्री और सियासी समीकरण
इस पूरे विवाद में पाकिस्तान का रोल निर्णायक रहा। बांग्लादेश के समर्थन में पाकिस्तान ने 15 फरवरी को भारत के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप मैच खेलने से इनकार कर दिया था। यह फैसला सिर्फ क्रिकेटिंग नहीं था, बल्कि साफ तौर पर राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश था।
आईसीसी के सामने हालात मुश्किल थे। अगर बांग्लादेश को दंडित किया जाता, तो पाकिस्तान के कदम को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता। और अगर दोनों पर सख्ती होती, तो टूर्नामेंट की विश्वसनीयता ही सवालों में घिर जाती।
यहीं से आईसीसी ने “डैमेज कंट्रोल” का रास्ता चुना।
‘सज़ा नहीं, समाधान’—ICC का तर्क
आईसीसी ने अपने बयान में कहा कि उसका नजरिया निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है और यह फैसला सज़ा देने के बजाय मदद करने की साझा सोच को दिखाता है।
यानी आईसीसी यह संकेत दे रहा है कि वह अपने फुल मेंबर्स को दंडित कर कोने में नहीं धकेलना चाहता, बल्कि उन्हें सिस्टम में बनाए रखना चाहता है।
2028–2031 के बीच बांग्लादेश को मेज़बानी
इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बांग्लादेश को राहत देने के साथ-साथ आईसीसी ने एक “काउंटर बैलेंस” भी दे दिया है।
आईसीसी ने पुष्टि की है कि बांग्लादेश को 2028 से 2031 के बीच किसी एक आईसीसी टूर्नामेंट की मेज़बानी दी जाएगी। यह आयोजन आईसीसी की सामान्य मेज़बानी प्रक्रिया, समयसीमा और संचालन संबंधी ज़रूरतों के अनुसार तय होगा।
इस फैसले को सिर्फ मुआवज़ा नहीं कहा जा सकता। यह एक संदेश है—आईसीसी बांग्लादेश को अभी भी एक भरोसेमंद क्रिकेटिंग राष्ट्र मानता है।
सुरक्षा कारण और स्कॉटलैंड की एंट्री
बांग्लादेश ने भारत में खेलने से इनकार करते वक्त सुरक्षा कारणों का हवाला दिया था। इसी वजह से टी20 वर्ल्ड कप में उनकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल किया गया।
हालांकि क्रिकेट फैंस और कई पूर्व खिलाड़ियों ने इस फैसले पर सवाल उठाए, लेकिन आईसीसी ने इसे टकराव का मुद्दा नहीं बनाया।
आईसीसी का रुख साफ रहा—बांग्लादेश की अनुपस्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन यह रिश्ता तोड़ने की वजह नहीं बनेगी।
ICC CEO संजोग गुप्ता का बयान
आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजोग गुप्ता ने कहा कि टी20 पुरुष विश्व कप में बांग्लादेश का नहीं होना खेदजनक है, लेकिन इससे आईसीसी की बांग्लादेश के प्रति प्रतिबद्धता में कोई बदलाव नहीं आएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि आईसीसी बीसीबी समेत सभी हितधारकों के साथ मिलकर काम करता रहेगा, ताकि देश में क्रिकेट का समग्र विकास हो और खिलाड़ियों को भविष्य में मौके मिलते रहें।
यह बयान संकेत देता है कि आईसीसी इस विवाद को “क्लोज्ड चैप्टर” बनाना चाहता है—कम से कम अभी के लिए।
ICC के सामने असली चुनौती
आईसीसी के लिए यह फैसला सिर्फ बांग्लादेश को राहत देना नहीं था। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है—जब राजनीति और सुरक्षा क्रिकेट में घुस आए, तो अंतरराष्ट्रीय संस्था को कितनी सख्ती दिखानी चाहिए?
अगर आईसीसी सज़ा देता, तो भविष्य में ऐसे फैसलों की बाढ़ आ सकती थी। और अगर बिल्कुल चुप रहता, तो नियमों की साख पर सवाल उठते।
इस बीच का रास्ता—राहत + मेज़बानी—शायद सबसे सुरक्षित विकल्प था।
















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