Buttler : मैं फिर करूंगा – मांकडिंग पर अश्विन का सबसे बड़ा बयान

Atul Kumar
Published On:
Buttler

Buttler – क्रिकेट में कुछ बहसें कभी खत्म नहीं होतीं। “मांकडिंग” उन्हीं में से एक है। और अगर उस बहस का चेहरा किसी एक खिलाड़ी को बनाया जाए—तो वो नाम है आर अश्विन।

साल 2019 की वो घटना… जोस बटलर, नॉन-स्ट्राइकर एंड, और एक रन-आउट—जिसने नियमों से ज्यादा “स्पिरिट ऑफ क्रिकेट” पर सवाल खड़े कर दिए थे। अब, कई साल बाद, अश्विन ने उस पूरे विवाद को फिर से छेड़ दिया है—और इस बार वो और भी ज्यादा साफ, और शायद ज्यादा बेबाक हैं।

“मैंने जीतने के लिए किया—और इसमें शर्म कैसी?”

अश्विन ने इस बार कोई diplomatic जवाब नहीं दिया।

उन्होंने सीधा कहा—

“हाँ, मैंने जीतने के लिए किया। और इसमें शर्म की क्या बात है?”

ये लाइन अपने आप में debate को दो हिस्सों में बांट देती है—

  • एक तरफ वो लोग जो “spirit” की बात करते हैं
  • दूसरी तरफ वो जो “rules are rules” मानते हैं

अश्विन साफ तौर पर दूसरे खेमे में खड़े हैं। और वो पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

मांकडिंग—rule या loophole?

थोड़ा context जरूरी है।

ICC के नियम (Law 38 – Run Out) के तहत, अगर नॉन-स्ट्राइकर क्रीज छोड़ देता है और गेंदबाज उसे रन आउट करता है—तो वो पूरी तरह वैध आउट है।

फिर भी controversy क्यों?

क्योंकि सालों से क्रिकेट में एक अनलिखा नियम रहा है—पहले चेतावनी दो, फिर आउट करो।

अश्विन ने वही परंपरा तोड़ी।

“लोग क्या कहेंगे”—असली दबाव यही है

अश्विन की बातों में एक दिलचस्प angle था—social pressure।

उन्होंने कहा—

  • खिलाड़ी ऐसा इसलिए नहीं करते क्योंकि डर होता है
  • “लोग क्या कहेंगे” ये सबसे बड़ा factor है

और honestly, ये point cricket से बाहर भी apply होता है।

कई बार decision सही या गलत नहीं होता—popular या unpopular होता है।

एक और घटना—जो शायद किसी को याद नहीं

अश्विन ने एक और incident शेयर किया—

मुंबई के खिलाफ मैच, आखिरी moments, दो रन चाहिए थे।

उन्होंने अपने bowler से कहा—

“नॉन-स्ट्राइकर को रन आउट कर दो।”

लेकिन bowler ने मना कर दिया।

क्यों?

क्योंकि उसे लगा—ये “गलत” लगेगा।

यहीं से Ashwin का frustration समझ आता है—rule allowed है, लेकिन culture रोक रहा है।

“अगर ICC को दिक्कत होती, तो नियम ही नहीं होता”

ये Ashwin का सबसे मजबूत तर्क है।

और logically देखें तो बात गलत भी नहीं है।

अगर कोई चीज़ unfair होती—

  • ICC उसे ban कर देता
  • या rules बदल देता

लेकिन उल्टा हुआ है—

ICC ने इसे और clearly define किया है।

तो सवाल ये उठता है—

क्या “spirit of cricket” subjective हो गया है?

टीम perspective—एक अलग कहानी

अश्विन ने एक और interesting बात कही—

बटलर को आउट करने के बाद उन्होंने टीम से कहा—

  • reaction की चिंता मत करो
  • media मैं संभाल लूंगा
  • हमें बस जीतना है

और टीम जीत गई।

यहां एक subtle लेकिन बड़ा point है—

captaincy decisions कभी-कभी unpopular होते हैं… लेकिन जरूरी होते हैं।

क्या बाकी bowlers को भी ऐसा करना चाहिए?

अश्विन का जवाब—हाँ, बिल्कुल।

उन्होंने कहा—

  • ये bowler का decision होना चाहिए
  • umpire का काम है फैसला देना
  • इसे unnecessarily complicated क्यों बनाया जाए?

और यहां वो एक broader change की बात कर रहे हैं—

cricket को “moral judgment” से निकालकर “rule-based clarity” की तरफ ले जाने की।

क्रिकेट बदल रहा है—और सोच भी

T20 era ने cricket को काफी pragmatic बना दिया है।

  • run-outs sharper हुए हैं
  • fielding aggressive हुई है
  • margins छोटे हो गए हैं

ऐसे में non-striker advantage लेना भी risk बन चुका है।

लेकिन क्या हर चीज़ rule से तय होनी चाहिए?

यहीं debate interesting हो जाती है।

अगर सब कुछ rules से ही तय होगा—

तो क्या “spirit of cricket” खत्म हो जाएगी?

या फिर—

क्या “spirit” सिर्फ एक flexible concept है, जिसे हर कोई अपने हिसाब से define करता है?

अश्विन clearly second option मानते हैं।

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