Manoj Prabhakar : कभी टीम इंडिया के स्टार ऑलराउंडर थे मनोज प्रभाकर, एक वर्ल्ड कप मैच ने खत्म किया करियर

Atul Kumar
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Manoj Prabhakar

Manoj Prabhakar – क्रिकेट में ऑलराउंडर की भूमिका हमेशा बेहद खास होती है। एक ऐसा खिलाड़ी जो बल्ले और गेंद दोनों से टीम के लिए योगदान दे, कप्तान को अतिरिक्त विकल्प देता है और प्लेइंग XI को संतुलन प्रदान करता है।

भारत को कपिल देव और हार्दिक पांड्या जैसे शानदार ऑलराउंडर मिले हैं, लेकिन इनके बीच एक नाम ऐसा भी रहा जिसने लंबे समय तक टीम इंडिया के लिए गेंद और बल्ले दोनों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई—मनोज प्रभाकर।

दिल्ली के इस ऑलराउंडर का अंतरराष्ट्रीय करियर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने नई गेंद से शानदार गेंदबाजी की, ओपनिंग बल्लेबाज की भूमिका निभाई और कई मौकों पर टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकाला। लेकिन उनके करियर के अंतिम दौर में विवादों ने ऐसी जगह बनाई कि एक वर्ल्ड कप मैच उनका आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला साबित हुआ।

बाद में उन्होंने भारतीय क्रिकेट में मैच फिक्सिंग को लेकर गंभीर आरोप लगाए और तत्कालीन कप्तान कपिल देव का नाम भी लिया। इसके बाद जांच हुई और अंततः बीसीसीआई ने प्रभाकर को पांच साल के लिए निलंबित कर दिया।

मनोज प्रभाकर का टीम इंडिया में डेब्यू

मनोज प्रभाकर ने 1984 में इंग्लैंड के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया था। हालांकि शुरुआती दौर में उन्हें टीम में अपनी जगह पक्की करने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

डेब्यू के बाद वह लगभग पांच साल तक भारतीय टीम से बाहर रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन किया।

उनकी मेहनत का परिणाम 1989 में मिला, जब उन्हें पाकिस्तान दौरे के लिए भारतीय टीम में वापसी का मौका मिला। यही वह दौरा था जिसे क्रिकेट फैंस सचिन तेंदुलकर के अंतरराष्ट्रीय डेब्यू के लिए भी याद करते हैं।

पाकिस्तान दौरे पर गेंद से मचाया धमाल

1989 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट सीरीज में प्रभाकर ने अपनी गेंदबाजी से चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा।

कराची टेस्ट में उन्होंने 5 विकेट हासिल किए, जबकि फैसलाबाद टेस्ट में उनके खाते में 6 विकेट आए।

इस प्रदर्शन के बाद भारतीय टीम में उनकी जगह मजबूत हो गई और वह जल्द ही टीम के प्रमुख न्यू बॉल स्पेशलिस्ट बन गए।

प्रभाकर की खासियत यह थी कि वह गेंद को दोनों तरफ स्विंग कराने की क्षमता रखते थे और नई गेंद से बल्लेबाजों को परेशान करते थे।

गेंदबाज के साथ-साथ ओपनर भी बने

मनोज प्रभाकर सिर्फ गेंदबाजी तक सीमित नहीं रहे। भारतीय टीम को जब जरूरत पड़ी तो उन्होंने बल्लेबाजी में भी जिम्मेदारी संभाली।

उन्हें कई मौकों पर ओपनिंग बल्लेबाज के रूप में उतारा गया। इस तरह वह टीम के लिए एक वास्तविक ऑलराउंडर बन गए।

उनकी उपयोगिता इस बात से समझी जा सकती है कि वह नई गेंद से गेंदबाजी करने के साथ-साथ पारी की शुरुआत करने के लिए भी मैदान पर उतरते थे।

आंकड़े बताते हैं कितने शानदार ऑलराउंडर थे प्रभाकर

मनोज प्रभाकर के अंतरराष्ट्रीय और घरेलू क्रिकेट के आंकड़े उनकी ऑलराउंड क्षमता को साफ तौर पर दिखाते हैं।

फॉर्मेटरनविकेट
टेस्ट क्रिकेट1,60096
वनडे क्रिकेट1,858157
फर्स्ट क्लास क्रिकेट7,469385

फर्स्ट क्लास क्रिकेट में प्रभाकर ने 41.49 की औसत से 7,469 रन बनाए और 385 विकेट हासिल किए। यह रिकॉर्ड बताता है कि वह सिर्फ पार्ट-टाइम गेंदबाज या उपयोगी बल्लेबाज नहीं, बल्कि घरेलू क्रिकेट में भी एक प्रभावशाली ऑलराउंडर थे।

1994 का कानपुर टेस्ट और 102 रन की पारी

मनोज प्रभाकर के करियर का एक बेहद चर्चित मुकाबला 1994 में कानपुर में वेस्टइंडीज के खिलाफ आया।

भारत के सामने 258 रन का लक्ष्य था। प्रभाकर ने 154 गेंदों पर 102 रन की नाबाद पारी खेली।

लेकिन उनकी इस पारी को लेकर बाद में सवाल उठे। भारत लक्ष्य का पीछा करने के बजाय बेहद धीमी गति से आगे बढ़ा और अंततः टीम 211/5 तक ही पहुंच सकी।

भारत यह मुकाबला 46 रन से हार गया।

इस मैच के बाद प्रभाकर की बल्लेबाजी और उनके खेलने के तरीके पर सवाल उठने लगे। बाद के वर्षों में भारतीय क्रिकेट में भ्रष्टाचार और मैच फिक्सिंग की जांच के दौरान इस मुकाबले से जुड़ी चर्चाएं भी सामने आईं।

हालांकि मैच फिक्सिंग साबित नहीं हुई, लेकिन यह विवाद प्रभाकर के करियर की कहानी का हिस्सा बन गया।

1996 वर्ल्ड कप में हुआ करियर का अंत

इसके बाद आया 1996 वनडे वर्ल्ड कप, जहां श्रीलंका के खिलाफ दिल्ली में खेला गया मुकाबला प्रभाकर के अंतरराष्ट्रीय करियर का आखिरी मैच बन गया।

भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 271/3 का मजबूत स्कोर बनाया। सचिन तेंदुलकर ने शानदार 137 रन की पारी खेली।

लेकिन ओपनिंग करने उतरे प्रभाकर का बल्ला नहीं चला। वह 36 गेंदों में सिर्फ 7 रन बना सके।

गेंदबाजी में भी उनका प्रदर्शन निराशाजनक रहा।

जयसूर्या और कालूवितरणा ने उड़ाए भारतीय गेंदबाजों के होश

श्रीलंका की पारी शुरू होते ही सनथ जयसूर्या और रोमेश कालूवितरणा ने भारतीय गेंदबाजों पर आक्रमण शुरू कर दिया।

प्रभाकर ने अपने शुरुआती चार ओवरों में ही 47 रन खर्च कर दिए।

बाद में जब उन्हें दोबारा गेंदबाजी के लिए लाया गया तो उन्होंने ऑफ-स्पिन का सहारा लिया। लेकिन तब तक मुकाबला भारत के हाथ से निकल चुका था।

श्रीलंका ने मुकाबला जीत लिया और यह मैच प्रभाकर के अंतरराष्ट्रीय करियर का आखिरी मैच साबित हुआ।

इंग्लैंड दौरे से बाहर हुए तो लिया संन्यास

1996 वर्ल्ड कप के बाद प्रभाकर को इंग्लैंड दौरे के लिए भारतीय टीम में जगह नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया।

लेकिन उनका क्रिकेट करियर यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद भारतीय क्रिकेट में सामने आए सबसे बड़े विवादों में से एक में उनका नाम प्रमुखता से जुड़ गया।

कपिल देव पर लगाया था 25 लाख रुपये का गंभीर आरोप

बाद में मनोज प्रभाकर ने भारतीय क्रिकेट में मैच फिक्सिंग को लेकर सनसनीखेज आरोप लगाए।

उन्होंने दावा किया कि 1994 के सिंगर कप के दौरान एक भारतीय टीममेट ने उन्हें खराब प्रदर्शन करने के लिए 25 लाख रुपये की पेशकश की थी।

बाद में प्रभाकर ने इस आरोप के सिलसिले में कपिल देव का नाम लिया।

कपिल देव ने इन आरोपों से इनकार किया।

मामला गंभीर होने के बाद जांच एजेंसियों ने इसकी पड़ताल की।

CBI जांच में प्रभाकर के आरोपों को नहीं मिला पर्याप्त सबूत

केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने मामले की जांच की।

जांच के बाद CBI को कपिल देव के खिलाफ प्रभाकर के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय सबूत नहीं मिले।

इसके बाद विवाद ने एक अलग मोड़ ले लिया और जांच प्रभाकर की गतिविधियों की ओर भी बढ़ी।

BCCI ने पांच साल के लिए किया निलंबित

जांच के दौरान प्रभाकर के कथित तौर पर सट्टेबाजों से संपर्क को लेकर भी सवाल उठे।

इसके बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी BCCI ने वर्ष 2000 में मनोज प्रभाकर को पांच साल के लिए निलंबित कर दिया।

इस तरह एक ऐसे खिलाड़ी का करियर, जिसने भारत के लिए बल्ले और गेंद दोनों से महत्वपूर्ण योगदान दिया था, विवादों के बीच खत्म हुआ।

मनोज प्रभाकर का करियर: शानदार शुरुआत, विवादित अंत

प्रभाकर की कहानी भारतीय क्रिकेट में एक ऐसे ऑलराउंडर की कहानी है, जिसने अपनी मेहनत से टीम में जगह बनाई और लंबे समय तक नई गेंद से भारत को विकेट दिलाए।

वह बल्लेबाजी में ओपनिंग कर सकते थे और गेंदबाजी में नई गेंद संभाल सकते थे। उनके आंकड़े भी उनकी उपयोगिता की गवाही देते हैं।

लेकिन 1990 के दशक के मध्य में उनका करियर विवादों से घिर गया। 1996 वर्ल्ड कप में खराब प्रदर्शन, टीम से बाहर होना, संन्यास और फिर मैच फिक्सिंग के आरोपों ने उनकी क्रिकेट यात्रा को पूरी तरह बदल दिया।

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Atul Kumar

Atul Kumar

क्रिकेट को देखता हूं और समझता हूं और आप लोगों तक नए-नए सूचनाएं पहुंचाने की कोशिश करता हूं। लाइफ में हमेशा नई-नई चीजों को सीखने का शौक रखता हु, पुराने न्यूज़ को नए तरीके से प्रस्तुत करता हूं।

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