ODI – दिल्ली की सर्द शाम थी। होटल की ओर लौटती टीम बस, दिमाग में विजय हजारे ट्रॉफी का क्वार्टर फाइनल और हाथ में मोबाइल। तभी आयुष बदोनी के फोन पर वो मैसेज चमका, जिसका सपना हर घरेलू क्रिकेटर देखता है—भारत की टीम में पहली बार चयन। एक पल के लिए समय थम गया। अगले ही पल, मेहनत के सालों ने जैसे जवाब दे दिया—अब दरवाज़ा खुल चुका था।
न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले वनडे में वॉशिंगटन सुंदर के चोटिल होने के बाद सोमवार, 12 जनवरी को बीसीसीआई ने उन्हें सीरीज से बाहर किया। रिप्लेसमेंट के तौर पर जिस नाम पर मुहर लगी, वो था—आयुष बदोनी। बाहर की दुनिया उन्हें अब तक एक आक्रामक बल्लेबाज़ के रूप में जानती थी, लेकिन दिल्ली कैंप के भीतर कहानी कुछ और थी।
सिर्फ बैटर नहीं, पूरा पैकेज
दिल्ली के हेड कोच सरनदीप सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बदोनी की उस साइड को सामने रखा, जिस पर अक्सर नजर नहीं जाती।
उनके शब्दों में,
“वह सच में बहुत खुश था और मैं उसके लिए बहुत खुश था। उसने बहुत मेहनत की है। लोग उसे एक ऐसे बैटर के तौर पर जानते हैं जो जब चाहे बाउंड्री मार सकता है, लेकिन वह एक बेहतरीन ऑफ-स्पिनर भी है।”
यही वो लाइन है, जो बदोनी की एंट्री को सिर्फ इमरजेंसी रिप्लेसमेंट से ऊपर ले जाती है। टीम इंडिया को आजकल ऑलराउंड वैल्यू चाहिए—और बदोनी उसी दिशा में तैयार किए गए खिलाड़ी हैं।
“बैटिंग के बाद सात ओवर बॉलिंग”—कोच का सख्त टास्क
यह बदलाव यूं ही नहीं आया। सरनदीप सिंह ने एक साल पहले बदोनी के सामने साफ चुनौती रखी थी।
“मैंने उससे कहा था कि वह बहुत अच्छा बैट्समैन है, लेकिन हर बैटिंग सेशन के बाद घर जाने से पहले कम से कम सात ओवर बॉलिंग करनी होगी।”
थका हुआ शरीर, लंबा नेट सेशन—और फिर भी बदोनी ने बिना बहाने के गेंद उठाई। कई बार सात से ज्यादा ओवर डाले। यही वो फर्क है, जो घरेलू क्रिकेटर को अंतरराष्ट्रीय दरवाज़े तक ले जाता है।
ऑफ-स्पिन में धार, दिमाग में विविधता
कोच के मुताबिक, बदोनी की ऑफ-स्पिन अब सिर्फ कंट्रोल तक सीमित नहीं है।
उसमें टर्न, पेस वैरिएशन और सबसे अहम—स्मार्टनेस है।
- कैरम बॉल
- आर्म बॉल
- तेज़ टर्न लेती ऑफ-स्पिन
सरनदीप सिंह का मानना है कि अगर बदोनी एक ऑलराउंडर के तौर पर खुद को स्थापित करना चाहते हैं, तो स्पिन बॉलिंग ही उन्हें भारतीय टीम के कॉम्बिनेशन में फिट बनाती है।
टीम इंडिया की जरूरत और बदोनी का मौका
वॉशिंगटन सुंदर के बाहर होने से भारतीय टीम को एक ऐसा खिलाड़ी चाहिए था जो:
- मिडिल ऑर्डर में बैटिंग दे सके
- जरूरत पड़ने पर कुछ ओवर निकाल सके
घरेलू से अंतरराष्ट्रीय—एक मैसेज की दूरी
यह चयन उस रास्ते की कहानी है, जहां:
- एक कोच की सख्ती थी
- एक खिलाड़ी की ईमानदार मेहनत
- और सालों का धैर्य
विजय हजारे ट्रॉफी की तैयारी करते-करते अचानक टीम इंडिया की कॉल—ऐसे पल हर खिलाड़ी को नहीं मिलते।
आगे क्या?
बदोनी का चयन सिर्फ एक शुरुआत है। असली परीक्षा अब होगी:
- टीम कॉम्बिनेशन में जगह
- अंतरराष्ट्रीय दबाव
- और मौके का पूरा इस्तेमाल
लेकिन अगर दिल्ली के कोच की बातों पर भरोसा करें, तो बदोनी सिर्फ “नेट्स का खिलाड़ी” नहीं हैं। वह स्मार्ट क्रिकेटर हैं—और यही आज के क्रिकेट में सबसे बड़ी योग्यता है।















