BCCI : आईसीसी रेवेन्यू भारत को 40% हिस्सा – बहस क्यों तेज हुई

Atul Kumar
Published On:
BCCI

BCCI – क्रिकेट के ग्लैमरस स्टेडियमों की रोशनी के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी है—पैसे का खेल। और इस बार नीदरलैंड क्रिकेट बोर्ड के सदस्य राशिद शाह ने सीधे आईसीसी के रेवेन्यू मॉडल पर सवाल उठा दिए हैं। उनका आरोप साफ है: मौजूदा मॉडल एसोसिएट देशों के लिए “प्रतिकूल” है, क्योंकि पैसा बड़े देशों—खासतौर पर भारत—की झोली में ज्यादा जा रहा है।

बात नई नहीं है, लेकिन आवाज इस बार खुलकर उठी है।

आईसीसी का रेवेन्यू मॉडल: आंकड़े क्या कहते हैं?

आईसीसी के 2024–2027 चक्र में कुल अनुमानित वार्षिक राजस्व लगभग 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताया गया है। इसमें से लगभग 533 मिलियन डॉलर 12 पूर्ण सदस्य देशों को मिलते हैं, जबकि एसोसिएट देशों के हिस्से में करीब 67 मिलियन डॉलर आते हैं।

यानी कुल हिस्से का लगभग 11% से भी कम।

2024–27 चक्र का अनुमानित वितरण

श्रेणीअनुमानित वार्षिक राशि (USD)प्रतिशत
भारत~231 मिलियन~40%
अन्य पूर्ण सदस्य (कुल)~302 मिलियन~50%
एसोसिएट सदस्य (कुल)~67 मिलियन~11%
कुल~600 मिलियन100%

भारत को लगभग 40% हिस्सा मिलने का अनुमान है—करीब 231 मिलियन डॉलर सालाना। वजह साफ है: मीडिया राइट्स, ब्रॉडकास्ट वैल्यू और मार्केट साइज। क्रिकेट की अर्थव्यवस्था में भारत सबसे बड़ा इंजन है।

राशिद शाह की आपत्ति

राशिद शाह का तर्क है कि एसोसिएट देशों को बड़े देशों के साथ खेलने के अवसर कम मिलते हैं और वित्तीय हिस्सा भी बेहद सीमित है। उनका कहना है:

“हम आईसीसी के एसोसिएट सदस्य हैं… हमें बड़े देशों के साथ खेलने का मौका कम मिलता है। आईसीसी का व्यावसायिक मॉडल हमारे लिए प्रतिकूल है।”

उनकी शिकायत सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है—मुद्दा अवसर और विकास का भी है।

नीदरलैंड ने टी20 वर्ल्ड कप 2026 में हिस्सा लिया और ग्रुप ए में भारत, पाकिस्तान और नामीबिया से खेला। नामीबिया को हराया भी। लेकिन विश्व कप जैसे टूर्नामेंट साल में एक बार नहीं आते। बाकी समय फंडिंग और एक्सपोजर सीमित रहता है।

भारत की भूमिका: आलोचना और प्रशंसा साथ-साथ

दिलचस्प बात यह है कि राशिद शाह ने बीसीसीआई की उपलब्धियों की सराहना भी की। उन्होंने माना कि भारत विश्व क्रिकेट का सबसे बड़ा बाजार है और राजस्व का प्रमुख स्रोत भी।

वास्तविकता यह है कि आईसीसी की आय का बड़ा हिस्सा भारतीय मीडिया अधिकारों से आता है। अगर भारत का बाजार इतना बड़ा न होता, तो कुल राजस्व भी इतना नहीं होता।

यानी समीकरण जटिल है—
भारत ज्यादा कमाता है क्योंकि वह ज्यादा कमाई लाता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास के लिए संतुलन जरूरी है?

एसोसिएट देशों की चुनौती

एसोसिएट टीमों के सामने तीन बड़ी समस्याएं हैं:

  1. नियमित बड़े मुकाबलों की कमी
  2. सीमित घरेलू ढांचा और निवेश
  3. ब्रॉडकास्ट और स्पॉन्सरशिप की कमी

राशिद शाह का कहना है कि एसोसिएट देशों को “अपने मॉडल” विकसित करने होंगे। यानी सिर्फ आईसीसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं।

उन्होंने अहमदाबाद में 70,000 दर्शकों के सामने खेलने को “बहुत बड़ी उपलब्धि” बताया। यह एक्सपोजर और प्रेरणा देता है—लेकिन स्थायी विकास के लिए निरंतर समर्थन चाहिए।

क्या मॉडल बदल सकता है?

आईसीसी का मौजूदा वितरण मॉडल 2023 में स्वीकृत हुआ था, जिसमें भारत को सबसे बड़ा हिस्सा मिला। तर्क था—राजस्व योगदान के अनुपात में वितरण।

लेकिन आलोचक कहते हैं कि अगर खेल को वैश्विक बनाना है, तो छोटे देशों में निवेश जरूरी है। फुटबॉल की तरह एक अधिक समावेशी मॉडल क्रिकेट को नए बाजार दे सकता है।

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