Bihar – पटना के मोइनुल हक स्टेडियम में एक वक्त ऐसा था जब घास से ज्यादा सन्नाटा दिखता था। बिहार के खिलाड़ी ट्रायल से ज्यादा ट्रेनों में वक्त बिताते थे—झारखंड, दिल्ली, बंगाल… कहीं भी जहां मौका मिल जाए।
“बिहार क्रिकेट” एक वाक्यांश भर रह गया था। लेकिन आज तस्वीर अलग है। रणजी ट्रॉफी में एलीट ग्रुप, आईपीएल में चयन, और वैभव सूर्यवंशी जैसा नाम जो 14 साल की उम्र में सुर्खियों में है। यह बदलाव अचानक नहीं आया—इसके पीछे लंबी प्रशासनिक और राजनीतिक लड़ाई है।
2017 का मोड़: सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा समिति
कहानी की असली शुरुआत 2017 से होती है। लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि हर राज्य का एक ही मान्यता प्राप्त क्रिकेट संघ होगा। इसी आदेश के बाद बिहार क्रिकेट संघ (BCA) को दोबारा संरचनात्मक मान्यता मिली। सालों की कानूनी लड़ाई और प्रशासनिक अव्यवस्था के बाद क्रिकेट को आधिकारिक छत मिली।
यही वह बिंदु था जहां से “संघर्ष” से “संरचना” की ओर कदम बढ़े।
2019: राकेश तिवारी का दौर
2019 में राकेश तिवारी बीसीए अध्यक्ष बने। राजनीतिक पृष्ठभूमि—बिहार भाजपा के कोषाध्यक्ष—ने उन्हें प्रशासनिक पहुंच दी। लेकिन सवाल था: क्या वह क्रिकेट को पटरी पर ला पाएंगे?
छह साल के कार्यकाल में कुछ ठोस बदलाव दिखे:
| प्रतियोगिता | पहले स्थिति | अब स्थिति |
|---|---|---|
| रणजी ट्रॉफी | प्लेट ग्रुप | एलीट ग्रुप |
| सीके नायुडू (U-23) | प्लेट | एलीट |
| विजय हजारे ट्रॉफी | प्लेट | उन्नत प्रदर्शन |
रणजी ट्रॉफी का एलीट ग्रुप में प्रवेश प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। एलीट में खेलना मतलब मजबूत टीमों से नियमित मुकाबला, बेहतर एक्सपोजर और चयनकर्ताओं की नजर।
अब अध्यक्ष पद पर उनके बेटे हर्षवर्धन तिवारी हैं—यानी सत्ता का ट्रांजिशन परिवार के भीतर हुआ है, जिसने राजनीतिक बहस को भी जन्म दिया है।
वैभव सूर्यवंशी प्रतिभा या विवाद
अगर बिहार क्रिकेट की नई पहचान का कोई चेहरा है, तो वह वैभव सूर्यवंशी हैं। महज 14 साल की उम्र में रणजी ट्रॉफी खेलना—यह अपने आप में खबर है। यूथ ओडीआई क्रिकेट में 100 छक्के। अंडर-19 विश्व कप में प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट। और आईपीएल फ्रेंचाइज़ी राजस्थान रॉयल्स द्वारा रिटेंशन।
वैभव की उपलब्धियों की सूची:
| उपलब्धि | विवरण |
|---|---|
| रणजी डेब्यू | 14 वर्ष की उम्र में |
| यूथ ODI | 100 छक्कों का रिकॉर्ड |
| U-19 WC | प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट |
| IPL | राजस्थान रॉयल्स द्वारा रिटेन |
इयान बिशप, क्रिस गेल, एबी डिविलियर्स जैसे दिग्गजों ने उनकी तारीफ की है। लेकिन हर सफलता के साथ सवाल भी उठे।
आईपीएल ऑक्शन में उनकी उम्र को लेकर विवाद हुआ। शुरुआती दौर में उनका नाम शामिल नहीं किया जा रहा था। आरोप लगे कि राकेश तिवारी ने बीसीसीआई से हस्तक्षेप कर उनका नाम आगे बढ़वाया। आलोचकों ने “हितों के टकराव” की बात की। समर्थकों का तर्क था—प्रतिभा उम्र से बड़ी होती है।
राकेश तिवारी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने उम्र नहीं, टैलेंट देखा।
सिस्टम का पुनर्निर्माण
बिहार क्रिकेट की असली परीक्षा सिर्फ एक स्टार खिलाड़ी से नहीं होगी। असली बदलाव तब माना जाएगा जब:
- जिला स्तर पर संरचना मजबूत हो
- नियमित आयु-समूह टूर्नामेंट हों
- कोचिंग और ग्राउंड सुविधाएं बेहतर हों
सूत्रों के मुताबिक, बीसीए ने पिछले वर्षों में जिला संघों को सक्रिय करने, टूर्नामेंट कैलेंडर तय करने और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की कोशिश की है। हालांकि आलोचक अब भी कहते हैं कि प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय रिपोर्टिंग में सुधार की गुंजाइश है।
राजनीति और क्रिकेट दूरी या निकटता
राकेश तिवारी का राजनीतिक बैकग्राउंड इस पूरी कहानी का अहम हिस्सा है। बिहार में क्रिकेट लंबे समय तक गुटबाजी का शिकार रहा। राजनीतिक प्रभाव ने जहां एक ओर संसाधन जुटाने में मदद की, वहीं पारिवारिक उत्तराधिकार ने सवाल भी खड़े किए।
क्या यह संस्थागत मजबूती है या व्यक्तिगत प्रभाव? जवाब शायद आने वाले वर्षों में मिलेगा।
क्या यह स्थायी बदलाव है?
बिहार के कई खिलाड़ी पहले मजबूरी में राज्य छोड़कर अन्य टीमों से खेलते थे। अब हालात बदल रहे हैं। घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। आईपीएल स्काउट्स की नजर भी बिहार पर है।
लेकिन असली कसौटी होगी निरंतरता। एक-दो सीजन की सफलता कहानी नहीं बनाती। पांच-दस साल की स्थिरता बनाती है।















