Jurel – राजकोट की पिच पर जब ध्रुव जुरेल ने बड़ौदा के गेंदबाज़ों को थकाना शुरू किया, तो यह साफ हो गया था कि यह सिर्फ एक बड़ी पारी नहीं है। यह एक संकेत है।
विकेटकीपर-बल्लेबाज़ ने 101 गेंदों में नाबाद 160 रन ठोककर न सिर्फ अपनी लिस्ट-A करियर की पहली सेंचुरी लगाई, बल्कि यह भी जता दिया कि वह अब घरेलू क्रिकेट में सिर्फ “उभरता नाम” नहीं रहे।
विजय हजारे ट्रॉफी 2025–26 में जुरेल का बल्ला लगातार बोल रहा है। शुरुआती तीन मैचों में 153.5 की औसत से 307 रन—यह आंकड़ा अपने आप में काफी कुछ कह देता है।
भले ही चौथे मैच में असम के खिलाफ वह सिर्फ 17 रन ही बना सके हों, लेकिन फॉर्म पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। चर्चा अब सीधी टीम इंडिया तक पहुंच चुकी है।
राजकोट की पारी: जहां सब कुछ क्लिक हुआ
बड़ौदा के खिलाफ खेली गई 160* रन की पारी जुरेल के करियर की उन पारियों में गिनी जाएगी, जिनका ज़िक्र आगे भी होता रहेगा। यह पारी—
- तेज़ थी, लेकिन जल्दबाज़ नहीं
- आक्रामक थी, लेकिन गैर-ज़रूरी नहीं
- और सबसे अहम—कंट्रोल में थी
विकेटकीपर होने के बावजूद जुरेल ने लंबी पारी खेली, स्ट्राइक रोटेट की और मौके मिलने पर बड़े शॉट्स लगाए। यही वजह है कि इस पारी को सिर्फ “बड़ा स्कोर” कहकर नहीं टाला जा सकता।
विजय हजारे ट्रॉफी 2025–26: आंकड़े जो नजर खींचते हैं
चार मैचों के बाद ध्रुव जुरेल का टूर्नामेंट ग्राफ कुछ यूं है—
| मैच | रन | औसत |
|---|---|---|
| 4 | 307 | 153.5 |
यह औसत बताता है कि जुरेल सिर्फ रन नहीं बना रहे, बल्कि मैच में टिक रहे हैं। विकेटकीपर-बल्लेबाज़ के लिए यह एक बड़ी बात होती है—क्योंकि जिम्मेदारी दोगुनी होती है।
टीम इंडिया की चर्चा? जुरेल का जवाब बिल्कुल सीधा
जब जुरेल से पूछा गया कि इस फॉर्म के चलते वाइट-बॉल टीम इंडिया में चयन की बातें हो रही हैं, तो उन्होंने इसे हल्के अंदाज़ में लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में उनका जवाब किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए सीख जैसा था।
उनके शब्दों में—
“मैं खुद के लिए बहुत सारे लक्ष्य नहीं बनाता। मेरा फोकस प्रॉसेस पर रहता है… रिजल्ट और सिलेक्शन चाहे जो हो, कोई भी मेरी कड़ी मेहनत को मुझसे नहीं छीन सकता।”
यह बयान बताता है कि जुरेल अभी भविष्य के शोर में नहीं फंसे हैं। वह जानते हैं कि चयन मेहनत का नतीजा होता है, शोर का नहीं।
4–5 घंटे की तैयारी, रोज़ का नियम
जुरेल ने इंटरव्यू में यह भी बताया कि विजय हजारे ट्रॉफी से पहले जब भी समय मिलता था, वह—
- रोज़ 4–5 घंटे बल्लेबाज़ी अभ्यास करते
- खुद से सवाल करते कि “मैं और क्या कर सकता हूं”
- रिज़ल्ट से ज़्यादा तैयारी पर ध्यान देते
यही प्रोसेस-ड्रिवन सोच उन्हें बाकियों से अलग करती है। घरेलू क्रिकेट में अक्सर यही फर्क चयन तक ले जाता है।
रेड-बॉल क्रिकेट: जुरेल के दिल के सबसे करीब
जहां लोग उन्हें वाइट-बॉल की दौड़ में देख रहे हैं, वहीं ध्रुव जुरेल खुद दिल से टेस्ट क्रिकेट की बात करते हैं।
उन्होंने कहा—
“रेड-बॉल मेरे दिल के बहुत करीब है। टेस्ट क्रिकेट का अपना अलग ही वैल्यू है।”
भारत के लिए टेस्ट खेलने का अनुभव उनके लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि पहचान है। विदेश दौरे पर जब कोई आपको “टेस्ट क्रिकेटर” कहता है—उस सम्मान को जुरेल खास मानते हैं।
टेस्ट नहीं, लेकिन तैयारी जारी
भले ही अगले 7 महीनों तक भारत को कोई टेस्ट मैच नहीं खेलना है, लेकिन जुरेल का दिमाग पहले से आगे की सोच रहा है।
उन्होंने साफ कहा कि वह अभी से—
- श्रीलंका दौरे की कल्पना कर रहे हैं
- स्पिनरों के खिलाफ खेलने की प्लानिंग कर रहे हैं
- छोटी-छोटी चीज़ों पर काम कर रहे हैं
यही माइंडसेट अक्सर इंटरनेशनल लेवल पर लंबे समय तक टिकने में मदद करता है।
क्या वनडे टीम इंडिया की दहलीज़ पर हैं जुरेल?
यह सवाल अब उठना लाज़मी है। विकेटकीपर-बल्लेबाज़ की भूमिका में भारत के पास विकल्प हैं, लेकिन—
- लिस्ट-A में निरंतर रन
- दबाव में लंबी पारियां
- और प्रोसेस पर फोकस
ये तीन चीज़ें जुरेल के पक्ष में जाती हैं। चयन कब होगा, यह अलग बात है। लेकिन दरवाज़ा अब दूर नहीं लगता।
शोर से दूर, काम पर फोकस
ध्रुव जुरेल इस वक्त उस दौर में हैं, जहां एक बड़ी पारी करियर की दिशा बदल सकती है—और उन्होंने वह पारी खेल दी है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि वह इसे अंत नहीं, प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं।
160 रन की पारी सुर्खियां बटोरती है।
लेकिन 4–5 घंटे की रोज़ की मेहनत—करियर बनाती है।
और जुरेल फिलहाल उसी रास्ते पर चल रहे हैं।















