Test – टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस तीखे अंदाज़ में स्प्लिट कोचिंग की थ्योरी पर हमला बोला, वह साफ दिखाता है कि ड्रेसिंग रूम के भीतर का माहौल, जिम्मेदारियों की सीमाएँ और बाहरी शोर—इन सब पर उनकी धार बिल्कुल वैसी है जैसी मैदान पर उनकी बल्लेबाज़ी के दौर में दिखती थी।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज 0–2 से हारने के बाद कुछ प्रभावशाली नामों—जिसमें एक IPL टीम के मालिक भी शामिल हैं—ने रेड-बॉल और व्हाइट-बॉल फॉर्मेट के लिए अलग-अलग कोच रखने की बात उठाई। गंभीर ने इस पर जो कहा, वह भारतीय क्रिकेट के नेतृत्व ढांचे की दिशा को स्पष्ट करता है।
वनडे सीरीज 2–1 से जीतते ही गंभीर ने कोई गोलमोल जवाब नहीं दिया—उन्होंने इस विचार को ‘हैरान करने वाला’ कहा और साफ तौर पर यह भी कहा कि कई लोग अपने दायरे से बाहर की बातें कर रहे हैं।
“हम कप्तान के बिना पहला टेस्ट खेले… किसी ने नहीं लिखा”—गंभीर की चुभन साफ दिखी
गंभीर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो बातों पर सबसे ज्यादा नाराज़गी जताई:
- मीडिया ने यह नहीं बताया कि भारत पहला टेस्ट शुभमन गिल के बिना खेला, वह कप्तान भी थे और रेड-बॉल में टीम के टॉप बैट्समैन।
- बिना संदर्भ समझे टीम की आलोचना करना, या “स्प्लिट कोचिंग” जैसे सुझाव देना, एक तरह से क्रिकेट की वास्तविकताओं को नजरअंदाज करना है।
उन्होंने कहा:
“सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि किसी भी पत्रकार ने नहीं लिखा कि हमारा पहला टेस्ट कप्तान के बिना था, जिसने दोनों पारियों में बैटिंग नहीं की। जब आप ट्रांजिशन में होते हैं और आपका मेन बल्लेबाज़ बाहर होता है, तो यह बहुत बड़ा फैक्टर होता है।”
ये शब्द सिर्फ शिकायत नहीं थे—यह टीम को अनावश्यक दबाव से बचाने की कोशिश भी थी।
IPL मालिकों पर सीधा निशाना—“दायरे में रहना जरूरी है”
गंभीर ने बात घुमाई नहीं।
उन्होंने साफ कहा:
“एक IPL टीम के मालिक ने भी स्प्लिट कोचिंग की बात कही। लोगों का अपने दायरे में रहना जरूरी है। अगर हम किसी के दायरे में नहीं जाते तो उन्हें भी हमारे दायरे में आने का हक नहीं।”
यह बयान भारतीय क्रिकेट में एक बारीक लेकिन बढ़ती तनाव रेखा की ओर इशारा करता है—
फ्रेंचाइज़ी पावर बनाम राष्ट्रीय टीम का ढांचा।
IPL टीम मालिकों द्वारा राष्ट्रीय टीम के चयन या सपोर्ट स्टाफ मॉडल पर सार्वजनिक राय देना गंभीर को गलत लगा—और उनकी प्रतिक्रिया उसी स्तर की थी।
“बहाने नहीं बनाता… लेकिन फैक्ट्स छिपाने का भी कोई मतलब नहीं”
गौतम गंभीर का यह बयान बेहद कोच-जैसा लगा:
“मैं प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहाने नहीं बनाता। इसका मतलब यह नहीं कि आप देश के सामने फैक्ट्स न दिखाएं।”
यहां दो बातें छुपी हैं:
- गंभीर ने टीम की कमियों को स्वीकार किया है
- लेकिन गलत नैरेटिव को बढ़ने नहीं देना चाहते
SA जैसी टीम के खिलाफ कप्तान का चोटिल होना, भारतीय बल्लेबाज़ों का रेगिस्तान की गेंदबाज़ी के सामने संघर्ष, और ट्रांजिशनल फेज़—ये सभी वास्तविक क्रिकेटिंग तत्व हैं, न कि “स्प्लिट कोचिंग” का मामला।
असली मुद्दा: क्या भारत को स्प्लिट कोचिंग की जरूरत है?
गंभीर ने जिस तीखेपन से विरोध किया, उससे संकेत मिलते हैं कि:
- भारत अभी भी यूनिफाइड कोचिंग स्ट्रक्चर पर भरोसा रखता है
- उनके मुताबिक यह ड्रेसिंग रूम और खिलाड़ियों की स्थिरता के लिए जरूरी है
- और स्प्लिट कोचिंग की बहस मौजूदा टीम के क्रिकेटिंग मुद्दों से मेल नहीं खाती
गंभीर का संदेश साफ था—टीम की हार का समाधान बाहर से सलाह नहीं, अंदर से सुधार है।















