ICC – घरेलू दर्शकों के शोर के बीच जब अभिषेक शर्मा फिर एक बार शॉट हवा में लहराते हुए कैच दे बैठे, तो स्टेडियम में कुछ पल के लिए अजीब-सी खामोशी छा गई। दुनिया के नंबर-1 टी20 बल्लेबाज… और लगातार तीसरा मैच, फिर शून्य। टी20 वर्ल्ड कप 2026 में यह कहानी अब सिर्फ फॉर्म की नहीं, दबाव और लय की बन चुकी है।
अमेरिका, पाकिस्तान और अब नीदरलैंड—तीनों के खिलाफ अभिषेक बिना खाता खोले पवेलियन लौटे। आक्रामक इरादा दिखा, लेकिन अंजाम वही—गलत शॉट, छोटा सा टिकाव, और फिर निराशा।
नंबर-1 रैंकिंग, लेकिन रन कहाँ?
लेकिन विश्व कप अलग मंच होता है। यहां आंकड़े नहीं, मौजूदा फॉर्म बोलता है।
पिछले सात टी20 इंटरनेशनल मैचों में अभिषेक पांच बार शून्य पर आउट हुए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ खराब नहीं—चौंकाने वाला है। खासकर तब, जब वही बल्लेबाज पावरप्ले में गेंदबाजों पर टूट पड़ने के लिए जाना जाता है।
नेहरा के रिकॉर्ड की बराबरी
टी20 विश्व कप में बतौर भारतीय बल्लेबाज तीन बार शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड अब अभिषेक के नाम भी दर्ज हो गया है। इससे पहले यह अनचाहा रिकॉर्ड आशीष नेहरा के नाम था।
टी20 विश्व कप में भारत के लिए सबसे ज्यादा बार 0 पर आउट
| खिलाड़ी | बार 0 पर आउट |
|---|---|
| आशीष नेहरा | 3 |
| अभिषेक शर्मा | 3 |
| शिवम दुबे | 2+ |
| गौतम गंभीर | 2+ |
| रविंद्र जडेजा | 2+ |
| विराट कोहली | 2+ |
| अक्षर पटेल | 2+ |
(आंकड़े आधिकारिक मैच रिकॉर्ड और आईसीसी स्कोरकार्ड के आधार पर)
एक तेज गेंदबाज और एक ओपनर बल्लेबाज—दो अलग भूमिकाएं, लेकिन रिकॉर्ड की सूची में साथ खड़े। क्रिकेट कभी-कभी अजीब संयोग गढ़ता है।
2026: कैलेंडर ईयर का कड़वा आंकड़ा
बतौर सलामी बल्लेबाज एक कैलेंडर ईयर में सबसे ज्यादा बार शून्य पर आउट होने वालों की सूची में भी अब अभिषेक का नाम शामिल हो गया है।
2026 में वह पांच बार जीरो पर आउट हो चुके हैं। अगर एक बार और ऐसा हुआ, तो वह पाकिस्तान के साइम अयूब के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे—एक साल में सबसे ज्यादा बार 0 पर आउट होने का।
यह आंकड़ा सिर्फ व्यक्तिगत फॉर्म का नहीं, बल्कि शुरुआत की स्थिरता का भी संकेत देता है। ओपनर का रोल सिर्फ तेजी से रन बनाना नहीं, बल्कि नई गेंद की धार को कुंद करना भी होता है।
क्या है समस्या? टेक्निक या टेम्परामेंट?
मैच दर मैच पैटर्न लगभग एक जैसा रहा है।
पहले दो ओवर में आक्रामक शॉट की कोशिश। गेंद थोड़ी मूव करती है। टाइमिंग चूकती है। और फिर कैच।
कुछ पूर्व क्रिकेटरों ने इशारा किया है कि अभिषेक का बैक-लिफ्ट और फ्रंट-फुट कमिटमेंट जल्दी हो रहा है। नई गेंद स्विंग कर रही है, और वह इंतजार नहीं कर पा रहे। घरेलू पिचों पर अतिरिक्त उछाल भी उन्हें परेशान कर रहा है।
लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।
वर्ल्ड कप का दबाव अलग होता है। घरेलू मैदान, नंबर-1 का टैग, उम्मीदों का पहाड़। कभी-कभी खिलाड़ी शॉट खेलने से पहले ही परिणाम के बारे में सोचने लगता है। और वही एक सेकंड का फर्क विकेट बन जाता है।
टीम मैनेजमेंट का भरोसा
और वजह भी साफ है—पिछले डेढ़ साल में उन्होंने पावरप्ले स्ट्राइक रेट 150+ के आसपास रखा है। कई मौकों पर अकेले मैच पलटे हैं।
टी20 में फॉर्म उतनी ही तेजी से लौटता है जितनी तेजी से जाता है। एक 40 रन की तेज पारी, और सारी बहस खत्म।
क्या प्लेइंग इलेवन में बदलाव होगा?
यह बड़ा सवाल है।
भारत पहले ही सुपर-8 में पहुंच चुका है। ऐसे में क्या टीम मैनेजमेंट उन्हें एक और मौका देगा? या फिर किसी और ओपनर को आजमाएगा?
आमतौर पर बड़े टूर्नामेंट में टीम कॉम्बिनेशन बार-बार बदलना जोखिम भरा होता है। खासकर तब, जब खिलाड़ी की क्लास पर भरोसा हो।
लेकिन आंकड़े दबाव बना रहे हैं।
इतिहास गवाह है—वापसी संभव है
क्रिकेट में ऐसे कई उदाहरण हैं जब बड़े खिलाड़ी टूर्नामेंट की शुरुआत में संघर्ष करते रहे, लेकिन नॉकआउट में चमके। विराट कोहली, रोहित शर्मा, डेविड वॉर्नर—सबने ऐसे दौर देखे हैं।
अभिषेक अभी 20 के दशक में हैं। उनका खेल स्वाभाविक रूप से आक्रामक है। सवाल यह नहीं कि वह रन बनाएंगे या नहीं—सवाल यह है, कब?
और शायद वही “कब” भारत के अभियान की दिशा तय करेगा।
नंबर-1 रैंकिंग और शून्य के बीच फंसे अभिषेक शर्मा इस वर्ल्ड कप की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक बन गए हैं। आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं, लेकिन क्लास अब भी उनके साथ है।
क्रिकेट में फॉर्म अस्थायी है, क्षमता स्थायी—यह पुरानी कहावत है।
अब देखना यह है कि अगली पारी में बल्ला बोलेगा… या बहस और लंबी होगी।















