Test : घरेलू पिचें, व्हाइट-बॉल शेड्यूल और डोमेस्टिक—कपिल देव ने खोली भारत की टेस्ट गिरावट

Atul Kumar
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Test – कोलकाता और गुवाहाटी की सुबहें इस महीने क्रिकेट के लिहाज़ से भारी रहीं—स्कोरबोर्ड लड़खड़ाते रहे, विकेट ऐसे गिरे जैसे किसी ने धक्का दे दिया हो, और भारतीय फैंस के चेहरे पर वही पुरानी चिंता लौट आई जो विदेश दौरों पर दिखती थी। फर्क सिर्फ इतना कि यह घरेलू जमीन थी।
और 2024–25 में दूसरी बार भारत को अपने ही घर में क्लीन स्वीप झेलना पड़ा—0-2।
कभी जिन्हें दिल्ली–चेन्नई–कोलकाता की पिचें अभेद किला लगती थीं, वे अब तीन दिनों में नॉकआउट होकर लौट रही हैं।

नीचे गिरती ग्राफ और लगातार ढहती बल्लेबाज़ी को देखकर दिग्गजों की आवाज उठनी तय थी।
लेकिन इस आवाज़ में सबसे तेज़, साफ़ और सटीक बयान आया—कपिल देव की तरफ़ से।

तीन कारण।
तीन कमजोरियां।
और तीन रास्ते, जिनसे भारत एक बार फिर अपनी घरेलू ताकत वापस पा सकता है।

कपिल देव का कड़ा बयान—“डोमेस्टिक खेलो, बेहतर पिचें बनाओ, व्हाइट-बॉल कम करो”

स्पोर्टस्टार से बातचीत में कपिल देव ने इस हार को महज ‘बैड फॉर्म’ या ‘बुरे दिन’ कहने से इंकार किया।
उनके शब्दों में एक ऐसी सादगी और अनुभव था जो अनसुना नहीं किया जा सकता।

उनके मुताबिक भारत की तीन बड़ी समस्याएँ हैं—

  1. टॉप खिलाड़ी डोमेस्टिक क्रिकेट नहीं खेल रहे
  2. टेस्ट क्रिकेट की पिचें खराब बन रही हैं
  3. व्हाइट-बॉल क्रिकेट इतना बढ़ गया है कि खिलाड़ी कठिन परिस्थितियों का सामना कर ही नहीं रहे

यह तीन लाइनें भारतीय क्रिकेट की नस को छूती हैं।

खिलाड़ियों को डोमेस्टिक क्रिकेट में वापस भेजो—कपिल का पहला बड़ा तर्क

कपिल ने बिल्कुल सीधी बात कही—

“मैं जानना चाहता हूं कि आज कितने टॉप खिलाड़ी डोमेस्टिक क्रिकेट खेल रहे हैं?”

और सच यह है…
बहुत कम।

IPL – खेलते हैं
बड़ी सीरीज – खेलते हैं
लेकिन रणजी, दलीप ट्रॉफी, ईरानी कप—यहां शायद ही कोई बड़ा नाम लगातार दिखता है।

रणजी ट्रॉफी की कठिन पिचें, अपरिचित ग्राउंड, अलग-अलग राज्य बोर्डों के गेंदबाज—इन सबसे गुजरने से खिलाड़ी की बुनियाद मजबूत होती है।
कपिल देव का मतलब यही है:

“अगर आप डोमेस्टिक में अच्छे बॉलर्स का सामना नहीं करेंगे, तो टेस्ट में खड़े नहीं रह पाएंगे।”

और पिछले 12 महीनों में जो हुआ, वही इस बात का सबूत है।

घरेलू क्रिकेट में भारत के टॉप खिलाड़ियों की भागीदारी (अनुमानित ट्रेंड)

सीजनटेस्ट प्लेयर्स द्वारा खेले गए रणजी मैचIPL मैचअंतर
2015–164–614–16संतुलित
2018–192–314–16बढ़ता गैप
2022–240–214–17बड़ा अंतर

BCCI की मैच लोड डेटा रिपोर्ट खुद बताती है कि पिछले चार सालों में डोमेस्टिक भागीदारी 40–50% तक कम हुई है।

समस्या नंबर दो—टेस्ट पिचें या तो ज़्यादा आसान या ज़्यादा टेढ़ी

कपिल देव को कोलकाता टेस्ट सबसे ज्यादा खटका—
तीन दिनों में खत्म
दोनों टीमें 200 तक नहीं पहुंच सकीं
टॉस हारो = मैच हारो

कपिल ने कहा—
“ऐसी पिच का क्या मतलब जहां कोई टीम 200 तक न जाए? यह पांच दिन के खेल के लिए नहीं है।”

यह बात सुनने में सरल है, लेकिन इसके पीछे पूरा विज्ञान है।

टेस्ट क्रिकेट की पिच का उद्देश्य होता है—
पहले दो दिन बैटिंग
तीसरा-चौथा दिन स्पिन और रिवर्स स्विंग
पांचवे दिन अनिश्चितता

लेकिन भारत में या तो पिच बहुत आसान बनती है, जहां स्कोर 500+ चले जाते हैं…
या बहुत कठिन, जहां मैच 2–3 दिन में खत्म।

घरेलू टेस्ट पिचों की समस्या

  • अत्यधिक टर्न (दिन 1 से ही)
  • सूखी घास, अनियमित बाउंस
  • बल्लेबाज़ों के पास टिकने की जगह नहीं
  • गेंदबाजों को अति लाभ

और परिणाम यह है—
जो टीमें इन परिस्थितियों के लिए तैयार होकर आती हैं (जैसे SA), वे भारत को चौंका जाती हैं।

ICC के पिच आकलन दिशानिर्देश पहले से ही यह चेतावनी दे चुके हैं कि अत्यधिक कठिन पिच टेस्ट की गुणवत्ता को खराब करती है।

तीसरी समस्या—व्हाइट-बॉल क्रिकेट का दबदबा

कपिल देव ने कहा—

“हम T20 और ODI में इतने बिज़ी हैं कि बल्लेबाज़ बॉलर-फ्रेंडली पिच पर खेलना भूल चुके हैं।”

सच कहें, तो भारत में क्रिकेट का आर्थिक मॉडल ही व्हाइट-बॉल पर आधारित हो चुका है।

IPL
बिलेट्रल वनडे
टी20 लिग
फ्रेंचाइज़ क्रिकेट

इन सबने खिलाड़ियों को 140–145 की गेंद पर फ्लैट पिचों पर रन बनाने का आदी बना दिया है।

लेकिन टेस्ट क्रिकेट का स्वाद अलग है—
छिपी seam movement
धीमी turn
खराब patches
और patience की कला।

व्हाइट-बॉल में जो गलत शॉट ‘बाउंड्री’ है, टेस्ट में वही ‘खत्म’ कर देता है।

कपिल देव का संकेत साफ है—
व्हाइट-बॉल का समय कम करो, रेड-बॉल की प्रैक्टिस बढ़ाओ।

भारत घर में क्यों कमजोर पड़ा?

टेस्ट क्रिकेट में भारत की प्रतिष्ठा हमेशा घरेलू पिचों पर बनी।
कहावत थी—
“भारत में सीरीज जीतना सबसे कठिन काम है।”

लेकिन अब तस्वीर उलट रही है।

कारण:

  • बल्लेबाज़ धैर्य खो रहे
  • डोमेस्टिक में अनुभवी गेंदबाजों से मुकाबला नहीं
  • पिचें अत्यधिक प्रतिक्रियाशील
  • बल्लेबाज़ों की टेक्निक T20 मानसिकता में अटकी
  • गेंदबाजों पर workload बढ़ता जा रहा

कोहली, रोहित जैसे दिग्गजों के संन्यास के बाद भारतीय बल्लेबाज़ी पहले से ही युवा हाथों में है—और युवाओं की तैयारी कच्ची है।

कपिल देव की सलाह—क्या BCCI इसे लागू करेगा?

कई पूर्व क्रिकेटर कपिल के इस बयान का समर्थन कर चुके हैं।
BCCI ने भी पिछले कुछ वर्षों में “डोमेस्टिक मैच अनिवार्यता” पर चर्चा की है, लेकिन इसे कठोर रूप में लागू नहीं किया गया।

कुछ संभावित बदलाव जो देखने को मिल सकते हैं:

  • टेस्ट चयन से पहले 5–6 रणजी मैच अनिवार्य
  • पिच क्यूरेटरों को ICC रेटिंग के आधार पर प्रशिक्षण
  • T20 लीग खेलते खिलाड़ियों के लिए रेड-बॉल कैम्प
  • भारत A टूर (SA, ENG, AUS) अधिक नियमित
  • घरेलू टेस्ट सीरीज की पिचें 3–5 दिन की योजना के अनुरूप बनाना

भारत को यह समझना होगा—
घरेलू टेस्ट सिर्फ जीत नहीं, बल्कि टीम की गुणवत्ता का आईना होते हैं।

क्या भारत फिर से घरेलू किला बना सकता है?

हाँ।
भारत के पास संसाधन, खिलाड़ी, सुविधाएँ—सब कुछ है।
लेकिन डोमेस्टिक क्रिकेट की जड़ों को मजबूत किए बिना यह संभव नहीं।

Test क्रिकेट patience मांगता है।
और patience सिर्फ लंबे मैच खेलकर आता है।

कपिल देव का संदेश यही है—
“टेस्ट क्रिकेट की नींव मजबूत करो। बाकी सब अपने आप लौट आएगा।”

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