Ranji Trophy – ईडन गार्डन्स की उस दोपहर जब आखिरी रन बना और जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ी मैदान पर दौड़ पड़े, तो 67 साल का इंतजार एक पल में पिघल गया। ड्रेसिंग रूम की बालकनी में खड़े 41 साल के पारस डोगरा की आंखों में चमक थी—सिर्फ जीत की नहीं, सफर की। 24 साल लंबा, धैर्य से भरा, और आज जाकर मुकाम तक पहुंचा।
“क्रिकेट आपको इनाम देने से कहीं ज्यादा आपकी परीक्षा लेता है,” डोगरा ने मैच के बाद कहा। आवाज में थकान नहीं, संतोष था।
67 साल बाद पहली बार फाइनल
जम्मू-कश्मीर ने दो बार के चैंपियन बंगाल को छह विकेट से हराकर पहली बार रणजी ट्रॉफी फाइनल में जगह बनाई। 1959-60 में डेब्यू के बाद से यह राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सेमीफाइनल का स्कोरकार्ड भी कहानी कहता है:
सेमीफाइनल का संक्षिप्त स्कोर
| टीम | पहली पारी | दूसरी पारी |
|---|---|---|
| जम्मू-कश्मीर | 302 | 126/4 (जीत) |
| बंगाल | 328 | 99 |
पहली पारी में 26 रन की बढ़त गंवाने के बाद जम्मू-कश्मीर ने दूसरी पारी में बंगाल को सिर्फ 99 पर समेट दिया। वहीं मैच पलटा।
डोगरा: करियर का आखिरी मोड़, सबसे बड़ी उपलब्धि
पारस डोगरा ने 2001 में हिमाचल प्रदेश से अपने प्रथम श्रेणी करियर की शुरुआत की थी। फिर 2018-19 से 2023-24 तक पुडुचेरी के लिए खेले। 2024-25 सत्र से पहले उन्होंने जम्मू-कश्मीर का रुख किया—और एक साल में इतिहास लिख दिया।
उनके प्रथम श्रेणी आंकड़े प्रभावशाली हैं:
पारस डोगरा का प्रथम श्रेणी करियर
| मैच | रन | औसत | शतक | अर्धशतक | सर्वोच्च स्कोर |
|---|---|---|---|---|---|
| — | 10,517 | 48+ | 34 | 36 | 253 |
सेमीफाइनल के दौरान वह वसीम जाफर के बाद 10,000 रणजी रन पूरे करने वाले सिर्फ दूसरे बल्लेबाज बने।
“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं 10,000 रन तक पहुंच पाऊंगा। मुझे बस खेलना पसंद है,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
‘कमजोर’ टीम से फाइनलिस्ट तक
सीजन की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर को दावेदारों में नहीं गिना जा रहा था। टीम युवा थी, अनुभव सीमित। लेकिन डोगरा का अनुभव और शांत नेतृत्व धीरे-धीरे असर दिखाने लगा।
उन्होंने कहा, “हमें बस जिद्दी बने रहना होगा।”
यह वही जिद थी जिसने बंगाल जैसी मजबूत टीम को बैकफुट पर ला दिया।
मैच का टर्निंग पॉइंट: एक सत्र
बंगाल के कप्तान अभिमन्यु ईश्वरन ने स्वीकार किया कि मैच एक सत्र में हाथ से निकल गया।
“पहली पारी में बढ़त लेने के बाद हम आगे थे। लेकिन दूसरी पारी में हमने अच्छी बल्लेबाजी नहीं की,” ईश्वरन ने कहा।
25.1 ओवर में 99 रन—यही वह सत्र था जिसने मैच की दिशा बदल दी। जम्मू-कश्मीर के गेंदबाजों ने लाइन-लेंथ में निरंतरता रखी और दबाव बनाया।
टीम पहले, रिकॉर्ड बाद में
डोगरा के लिए व्यक्तिगत उपलब्धि महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन प्राथमिकता टीम रही।
“भगवान ने लिखा है कि हम फाइनल खेलेंगे,” उन्होंने हल्की हंसी के साथ कहा।
“मैं बहुत खुश हूं, लेकिन टीम का लक्ष्य सबसे ऊपर है।”
उन्होंने कोचिंग स्टाफ और प्रबंधन को भी श्रेय दिया, खासकर अपने करियर के इस अंतिम चरण में प्रेरित रखने के लिए।
घरेलू क्रिकेट का बदलता चेहरा
जम्मू-कश्मीर की यह उपलब्धि भारतीय घरेलू क्रिकेट के लिए भी बड़ा संकेत है। अब सिर्फ पारंपरिक ताकतें ही नहीं, बल्कि उभरती टीमें भी खिताब की दावेदार बन रही हैं।
रणजी ट्रॉफी का यह सीजन साबित कर रहा है कि धैर्य, संरचना और सही नेतृत्व से “अंडरडॉग” भी इतिहास लिख सकते हैं।
आगे क्या?
अब नजर फाइनल पर है। क्या जम्मू-कश्मीर इस ऐतिहासिक सफर को खिताब में बदल पाएगा?
क्या डोगरा अपने करियर के आखिरी अध्याय में ट्रॉफी उठा पाएंगे?
क्रिकेट में स्क्रिप्ट पहले से तय नहीं होती। लेकिन 41 साल का यह कप्तान एक बात साबित कर चुका है—उम्र सिर्फ संख्या है, जिद असली ताकत।















