MCG : जब भारत में हंगामा ऑस्ट्रेलिया में खामोशी पिच विवाद पर केविन पीटरसन

Atul Kumar
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MCG – मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड की पिच पर जैसे ही पहले दिन 20 विकेट गिरे, बहस का शोर स्कोरबोर्ड से ज़्यादा तेज़ हो गया। बॉक्सिंग डे टेस्ट में गेंदबाज़ों का ऐसा कहर पहले भी देखा गया है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ इंग्लैंड बनाम ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं रहा। बात सीधी जाकर टकराई—पिचों पर दोहरे मानदंड से।

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन और भारत के पूर्व विकेटकीपर दिनेश कार्तिक ने बिना लाग-लपेट के सवाल दागा—अगर भारत में पहले दिन विकेट गिरते हैं तो हंगामा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में वही हालात हों तो खामोशी क्यों?

यही सवाल अब क्रिकेट की वैश्विक बहस बन चुका है।

एमसीजी की पिच: तेज़ गेंदबाज़ों का स्वर्ग

मेलबर्न टेस्ट की पिच पर 10 मिमी घास छोड़ी गई थी। नतीजा? सीम मूवमेंट, उछाल और बल्लेबाज़ों के लिए हर गेंद एक नई चुनौती।
पहले दिन 20 विकेट, दूसरे दिन 16। कुल 36 विकेट सिर्फ दो दिन में।

यह चौथा टेस्ट था, और यह भी दूसरे दिन ही खत्म हो गया। इससे पहले पर्थ टेस्ट भी दो दिन में निपट चुका था। पूरी एशेज सीरीज़ में अब तक:

  • 4 टेस्ट
  • कुल संभावित दिन – 20
  • खेल हो पाया – सिर्फ 13 दिन

यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

केविन पीटरसन का सीधा तंज

केविन पीटरसन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:

“भारत में जब टेस्ट के पहले दिन कई विकेट गिरते हैं, तो पिचों और स्पिनरों पर जमकर हमला होता है। अब उम्मीद है कि ऑस्ट्रेलिया को भी वही आलोचना झेलनी पड़ेगी। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए।”

पीटरसन का इशारा साफ था—भारतीय पिचों को लेकर जो नैरेटिव बनाया जाता है, वही पैमाना ऑस्ट्रेलिया पर क्यों लागू नहीं होता?

दिनेश कार्तिक: ‘यकीन नहीं होता’

दिनेश कार्तिक ने भी सुर में सुर मिलाया, लेकिन अंदाज़ थोड़ा शांत, बात उतनी ही तीखी।

“एमसीजी की पिच देखने में साधारण लगती है। लेकिन यह हैरान करने वाला है कि चार में से दो एशेज टेस्ट सिर्फ दो दिन में खत्म हो गए। इतनी चर्चा के बावजूद चार टेस्ट 13 दिनों में पूरे हो गए।”

कार्तिक की बात दरअसल उस तुलना की ओर इशारा थी, जहां उपमहाद्वीप में अगर ऐसा हो जाए तो “टेस्ट क्रिकेट मर रहा है” जैसे बयान आम हो जाते हैं।

भारत की पिचें और पुरानी यादें

यह बहस अचानक नहीं उठी। उदाहरण साफ है—2020-21 अहमदाबाद टेस्ट।

उस सीरीज़ में:

  • इंग्लैंड ने चेन्नई में पहला टेस्ट जीता
  • अहमदाबाद में टर्निंग पिच
  • अश्विन और अक्षर पटेल का दबदबा
  • इंग्लैंड की बल्लेबाज़ी पूरी तरह ढह गई

उस वक्त क्या हुआ?

  • भारतीय पिचों पर सवाल
  • स्पिन को “अनफेयर एडवांटेज” कहा गया
  • ICC रेटिंग और आलोचना

अब वही हालात ऑस्ट्रेलिया में तेज़ गेंदबाज़ों के साथ दिखे—लेकिन प्रतिक्रिया वैसी नहीं।

माइकल वॉन का गुस्सा

इंग्लैंड के एक और पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने तो इसे सीधा मज़ाक करार दे दिया।

“यह पिच है या मज़ाक? 98 ओवर में 26 विकेट गिरना टेस्ट क्रिकेट के साथ नाइंसाफी है। खिलाड़ी, ब्रॉडकास्टर और सबसे ज़रूरी—फैंस—सबके लिए यह अच्छा नहीं है।”

वॉन की बात भावनात्मक भी थी और व्यावहारिक भी। टेस्ट क्रिकेट सिर्फ नतीजे नहीं, अनुभव भी है।

आकाश चोपड़ा का सवाल: अगर भारत में ऐसा होता?

भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा ने बहस को एक नए एंगल से देखा।

“डेढ़ दिन के टेस्ट में स्पिनरों ने एक भी ओवर नहीं डाला। ज़रा सोचिए, अगर उपमहाद्वीप में तेज़ गेंदबाज़ डेढ़ दिन तक एक भी ओवर न करें, तो क्या बवाल मच जाएगा।”

यह सवाल शायद इस पूरी बहस का सार है।

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया भी खुश नहीं

सबसे दिलचस्प बात?
क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया खुद एमसीजी की पिच से संतुष्ट नहीं है।

सीए के सीईओ टॉड ग्रीनबर्ग ने माना कि छोटे टेस्ट मैच लंबे समय में नुकसानदायक हैं।

“एक फैन के तौर पर यह रोमांचक था, लेकिन हम चाहते हैं कि टेस्ट मैच ज़्यादा समय तक चलें। हमने पिचों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई है, लेकिन जब व्यावसायिक असर दिखता है, तो इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता है।”

यह बयान अपने आप में स्वीकारोक्ति है कि कुछ तो गलत हुआ।

तेज़ गेंदबाज़ बनाम स्पिनर: असली मुद्दा क्या है?

सवाल यह नहीं है कि पिच तेज़ गेंदबाज़ों के लिए हो या स्पिनरों के लिए।
सवाल है—क्या एक ही पैमाना सबके लिए है?

अगर:

  • स्पिन मदद करे → “खराब पिच”
  • सीम मदद करे → “रोमांचक टेस्ट”

तो बहस अधूरी है।

टेस्ट क्रिकेट की आत्मा विविधता में है—कहीं स्पिन, कहीं स्विंग, कहीं बैलेंस। लेकिन दो दिन में खत्म होते मैच उस आत्मा पर चोट करते हैं।

बहस पिच की नहीं, नज़रिए की है

मेलबर्न की पिच ने सिर्फ विकेट नहीं गिराए, उसने क्रिकेट की सोच को भी कटघरे में खड़ा कर दिया।

केविन पीटरसन और दिनेश कार्तिक की बात इसलिए अहम है क्योंकि वे किसी एक टीम की नहीं, न्याय की बात कर रहे हैं।

अगर आलोचना करनी है, तो सबके लिए बराबर हो।
अगर हालात स्वीकार्य हैं, तो हर जगह।

वरना हर बार सवाल उठेगा—
क्या क्रिकेट में भी होम एडवांटेज का नैरेटिव चुनिंदा देशों के लिए अलग है?

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