Salahuddin – ढाका में माइक्रोफोन के सामने बैठे मोहम्मद सलाहुद्दीन के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था। शब्द सधे हुए थे, लेकिन तल्खी छुप नहीं रही थी। मुद्दा छोटा नहीं है—टी20 वर्ल्ड कप 2026 से बांग्लादेश का बाहर होना, और उस फैसले पर अलग-अलग दावे। अब सहायक कोच ने सीधे पूर्व खेल सलाहकार आसिफ नजरुल पर “यू-टर्न” लेने का आरोप लगा दिया है।
कहानी अब सिर्फ क्रिकेट नहीं रही। यह जवाबदेही, भरोसे और खिलाड़ियों की मानसिक हालत तक पहुंच चुकी है।
आरोप: “सरासर झूठ बोला”
सलाहुद्दीन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि नजरुल ने पहले दावा किया था कि भारत की यात्रा न करने का फैसला सरकार ने सुरक्षा कारणों से लिया। लेकिन इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि यह फैसला बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) और खिलाड़ियों ने मिलकर लिया था।
कोच का कहना है—खिलाड़ियों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी।
उनके शब्द कड़े थे।
“उन्होंने सरासर झूठ बोला… मैं खिलाड़ियों को अपना चेहरा कैसे दिखाऊंगा? उन्होंने यू-टर्न ले लिया।”
सलाहुद्दीन ने यह भी कहा कि ढाका विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े व्यक्ति से इस तरह का बयान बदलना स्वीकार्य नहीं है। यह सिर्फ बयानबाजी नहीं, भरोसे का संकट है।
खिलाड़ियों पर असर: “दो खिलाड़ी सदमे में थे”
सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है जो ड्रेसिंग रूम के अंदर हुआ।
सलाहुद्दीन के मुताबिक, टीम के दो खिलाड़ी पांच दिनों तक मानसिक रूप से टूटे रहे। “विश्व कप में खेलना हर खिलाड़ी का सपना होता है… और वह एक पल में खत्म हो गया।”
क्रिकेटरों के लिए विश्व कप सिर्फ टूर्नामेंट नहीं—करियर का शिखर होता है। स्पॉन्सरशिप, कॉन्ट्रैक्ट, रैंकिंग, पहचान—सब जुड़ा होता है। ऐसे में आखिरी समय में बाहर होना गहरा झटका देता है।
मानसिक स्वास्थ्य अब अंतरराष्ट्रीय खेल में बड़ा मुद्दा बन चुका है। कई खिलाड़ी खुलकर डिप्रेशन, एंग्जायटी पर बात कर चुके हैं। लेकिन एसोसिएट या एशियाई टीमों में यह चर्चा अभी भी परदे के पीछे रहती है।
फैसले की जिम्मेदारी किसकी?
यहीं सबसे बड़ा सवाल है।
अगर नजरुल का पहला बयान सही था—तो फैसला सरकारी स्तर पर था।
अगर दूसरा बयान सही है—तो बोर्ड और खिलाड़ी जिम्मेदार हैं।
दोनों बातें साथ-साथ सच नहीं हो सकतीं।
बीसीबी की ओर से अब तक स्पष्ट, विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं आया है (कम से कम आधिकारिक बयान की स्पष्टता के साथ)। ऐसे में विवाद और गहरा गया है।
स्कॉटलैंड की एंट्री
बांग्लादेश के हटने के बाद स्कॉटलैंड को टूर्नामेंट में शामिल किया गया। यह आईसीसी की प्रक्रिया के तहत संभव है—जहां वैकल्पिक टीम को मौका मिलता है।
लेकिन बांग्लादेश के खिलाड़ियों के लिए यह और भी कड़वा रहा होगा। उनकी जगह कोई और टीम खेल रही थी, और वे टीवी पर देख रहे थे।
राजनीतिक बनाम क्रिकेटिंग फैसला?
दक्षिण एशिया में क्रिकेट और राजनीति का रिश्ता पुराना है। सुरक्षा चिंताएं, द्विपक्षीय संबंध, कूटनीति—सब असर डालते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से हटना बड़ा कदम है।
अगर यह सुरक्षा का मामला था, तो क्या विस्तृत सुरक्षा मूल्यांकन साझा किया गया?
अगर यह बोर्ड का फैसला था, तो खिलाड़ियों से परामर्श क्यों नहीं हुआ—या हुआ भी तो क्या पारदर्शिता रही?
अभी इन सवालों के स्पष्ट जवाब सार्वजनिक डोमेन में नहीं हैं।
ड्रेसिंग रूम की चुप्पी
खिलाड़ी आमतौर पर बोर्ड या सरकार के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते। कॉन्ट्रैक्ट, करियर, चयन—सब दांव पर होता है। इसलिए कोच का यह बयान असामान्य है।
सलाहुद्दीन खुद लंबे समय से बांग्लादेश क्रिकेट से जुड़े हैं। घरेलू संरचना से लेकर राष्ट्रीय टीम तक उनका अनुभव है। उनका सार्वजनिक रूप से इतना सख्त बयान देना बताता है कि अंदर असंतोष गहरा है।















