Gurbaz – अहमदाबाद की रात, 90 हज़ार से ज्यादा दर्शक, और स्कोरबोर्ड पर टंगा हुआ 187। मैच पहले ही थ्रिलर बन चुका था, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह मुकाबला ‘डबल सुपर ओवर’ तक खिंच जाएगा। और जब आख़िरी गेंद पर रहमानुल्लाह गुरबाज छक्का नहीं जड़ पाए, तो सिर्फ एक टीम नहीं—एक पूरा ड्रेसिंग रूम सन्न रह गया।
दक्षिण अफ्रीका ने आखिरकार जीत दर्ज की। लेकिन सच कहें तो उस रात चर्चा हार की नहीं, एक जांबाज़ पारी की रही। 42 गेंदों पर 84 रन। स्ट्राइक रेट 200। चार चौके, सात छक्के। और हर शॉट में ऐसा इरादा जैसे दुनिया को बता रहे हों—अफगानिस्तान अब सिर्फ अंडरडॉग नहीं रहा।
हार के बाद गुरबाज की आंखें नम थीं। कैमरे सब कुछ पकड़ लेते हैं। और शायद वही तस्वीर युवराज सिंह तक भी पहुंची।
गुरबाज की पारी: दबाव में जन्मा तूफान
दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 187 रन बनाए। पिच बल्लेबाजी के लिए ठीक थी, लेकिन प्रोटियाज गेंदबाजी आक्रमण—रबाडा, एनगिडी, महाराज—को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अफगानिस्तान की शुरुआत लड़खड़ाई। लेकिन एक छोर पर गुरबाज खड़े रहे। उन्होंने सिर्फ रन नहीं बनाए, बल्कि मैच की नब्ज थामे रखी।
| आंकड़ा | प्रदर्शन |
|---|---|
| गेंदें | 42 |
| रन | 84 |
| चौके | 4 |
| छक्के | 7 |
| स्ट्राइक रेट | 200 |
उनकी बल्लेबाजी में कच्चापन नहीं, आत्मविश्वास था। रबाडा की बाउंसर पर पुल, महाराज की फ्लाइटेड गेंद पर लॉन्ग ऑन के ऊपर छक्का—ये शॉट्स सिर्फ ताकत नहीं, हिम्मत दिखाते हैं।
19.4 ओवर में पूरी टीम 187 पर ऑलआउट। मैच टाई। स्टेडियम में सन्नाटा और शोर—दोनों एक साथ।
डबल सुपर ओवर: सांसें थाम देने वाला ड्रामा
पहला सुपर ओवर—दोनों टीमों ने बराबरी कर ली। तनाव चरम पर।
दूसरे सुपर ओवर में दक्षिण अफ्रीका ने 23 रन ठोक दिए। लक्ष्य: 24 रन।
गेंद केशव महाराज के हाथ में। पहली गेंद डॉट। दूसरी पर मोहम्मद नबी आउट। अब समीकरण लगभग असंभव सा लग रहा था।
तभी गुरबाज स्ट्राइक पर आए।
तीन गेंदें। तीन छक्के।
अहमदाबाद की हवा जैसे रुक गई हो। हर छक्का सिर्फ स्कोरबोर्ड नहीं, उम्मीद बढ़ा रहा था। आखिरी गेंद पर चौका या छक्का चाहिए था। लेकिन महाराज ने लेंथ बदली। गुरबाज बड़ा शॉट खेलने गए—और आउट।
मैच खत्म। दक्षिण अफ्रीका विजेता।
लेकिन उस पल गुरबाज जमीन पर बैठे थे, सिर झुकाए। यह सिर्फ एक विकेट नहीं था, एक सपना था जो हाथ से फिसल गया।
युवराज सिंह का संदेश: “जादूगर कभी हार नहीं मानते”
युवराज सिंह ने सोशल मीडिया पर जो लिखा, वह सिर्फ तारीफ नहीं, एक बड़े खिलाड़ी की पहचान थी।
उन्होंने कहा, “रहमानुल्लाह गुरबाज, हताश मत होना। आपने आखिरी गेंद तक अपने देश के लिए लड़ाई लड़ी। सिर्फ वही लोग जादूगर कहलाते हैं जो अंत तक हार नहीं मानते।”
युवराज का ‘जादूगर’ शब्द यूं ही नहीं आया। 2007 टी20 वर्ल्ड कप, 2011 वनडे वर्ल्ड कप—दबाव में खेलने का मतलब क्या होता है, यह उनसे बेहतर कौन समझेगा?
उन्होंने आगे यह भी कहा कि आज दक्षिण अफ्रीका की जीत से ज्यादा चर्चा अफगानिस्तान की इस हार की होगी। और सच पूछिए तो सोशल मीडिया पर यही दिखा। क्रिकेट फैंस गुरबाज की पारी को सलाम कर रहे थे।
अफगानिस्तान: अब कोई हल्की टीम नहीं
कुछ साल पहले तक अफगानिस्तान को बड़े मंच पर अनुभवहीन माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।
| टीम | स्थिति |
|---|---|
| दक्षिण अफ्रीका | डबल सुपर ओवर में जीत |
| अफगानिस्तान | टक्कर की हार, लेकिन नैतिक जीत |
अफगानिस्तान ने दिखा दिया कि वे सिर्फ भाग लेने नहीं, मुकाबला करने आए हैं। उनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता है, गेंदबाजी में विविधता।
गुरबाज जैसे खिलाड़ी नई पीढ़ी का चेहरा हैं—निडर, आक्रामक, और बड़े मंच से बेखौफ।
भावनाएं और बड़ा मंच
क्रिकेट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है। यह भावनाओं का खेल भी है।
जब गुरबाज आखिरी गेंद पर आउट हुए, तो उनके चेहरे पर जो मायूसी थी, वह हार से ज्यादा जिम्मेदारी का बोझ थी। एक खिलाड़ी जो जानता है कि वह टीम को जीत दिला सकता था—लेकिन नहीं दिला पाया।
युवराज का संदेश शायद इसी बोझ को हल्का करने के लिए था।
बड़े खिलाड़ी हार को समझते हैं। वे जानते हैं कि कुछ हारें भविष्य की जीत की नींव होती हैं।
आगे की राह
अफगानिस्तान के लिए यह हार कड़वी जरूर है, लेकिन आत्मविश्वास तोड़ने वाली नहीं। अगर वे 187 के लक्ष्य का पीछा कर सकते हैं, सुपर ओवर में बराबरी कर सकते हैं, और दूसरे सुपर ओवर में 24 रन के लक्ष्य के करीब पहुंच सकते हैं—तो वे किसी भी टीम को चुनौती दे सकते हैं।
गुरबाज की पारी क्रिकेट इतिहास में भले ट्रॉफी के रूप में दर्ज न हो, लेकिन जज्बे के उदाहरण के तौर पर जरूर याद की जाएगी।
कभी-कभी स्कोरकार्ड हार दिखाता है, लेकिन कहानी जीत की होती है।
और उस रात, कहानी गुरबाज की थी।















