Dravid : टी20 में उड़ान टेस्ट में संघर्ष – द्रविड़ ने बताई असली वजह

Atul Kumar
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Dravid

Dravid – बेंगलुरु के एक शांत से बुक लॉन्च इवेंट में कही गई राहुल द्रविड़ की बातें अचानक भारतीय टेस्ट क्रिकेट की सबसे बड़ी बहस बन गईं। मंच पर रोहित शर्मा की किताब थी, लेकिन चर्चा भारत की लाल गेंद वाली चिंता पर आकर टिक गई।

द्रविड़ ने बिना किसी लाग-लपेट के वह बात कह दी, जो ड्रेसिंग रूम के भीतर काफी समय से महसूस की जा रही है—तीनों फॉर्मेट खेलने वाले भारतीय बल्लेबाज़ों को टेस्ट क्रिकेट के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा।

नतीजा?
घर में 12 साल तक अजेय रहने वाली भारतीय टीम ने अपनी पिछली तीन घरेलू टेस्ट सीरीज में से दो गंवा दीं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, चेतावनी है।

चार–पांच महीने बाद लाल गेंद हाथ में आती है

रोहित शर्मा पर लिखी किताब The Rise of Hitman: The Rohit Sharma Story के लॉन्च के दौरान द्रविड़ ने कोच के तौर पर अपने अनुभव साझा किए। उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, बल्कि एक ठोस हकीकत थी।

उनके शब्दों में,
“तीनों फॉर्मेट खेलने वाले खिलाड़ी लगातार एक फॉर्मेट से दूसरे में स्विच कर रहे हैं। कई बार ऐसा हुआ कि हम टेस्ट मैच से सिर्फ तीन-चार दिन पहले पहुंचे, और तब पता चला कि कुछ खिलाड़ियों ने चार या पांच महीने से लाल गेंद से क्रिकेट खेली ही नहीं है।”

यहीं से असली समस्या शुरू होती है।

टेस्ट क्रिकेट सिर्फ धैर्य नहीं मांगता,
यह स्पेशलाइज्ड स्किल मांगता है।

  • सीम करती गेंद पर लंबा समय खेलना
  • टर्न लेने वाली पिच पर बैट–पैड कंट्रोल
  • घंटों तक एकाग्रता बनाए रखना

ये सब कुछ “रीसेट बटन” दबाकर वापस नहीं आता।

गिल की चिंता, द्रविड़ की मुहर

दिलचस्प बात यह है कि यही चिंता हाल ही में भारत के टेस्ट कप्तान शुभमन गिल ने भी जताई थी। गिल ने खुले तौर पर कहा कि खिलाड़ियों को टेस्ट सीरीज से पहले पर्याप्त तैयारी का समय नहीं मिल रहा और बीसीसीआई को शेड्यूल बनाते वक्त इस पर ध्यान देना चाहिए।

द्रविड़ ने गिल के बयान को पूरी तरह जायज़ ठहराया।

“मेरी पीढ़ी में, जब सिर्फ दो फॉर्मेट थे और फ्रेंचाइज़ी क्रिकेट नहीं था, तब कई बार मुझे टेस्ट सीरीज की तैयारी के लिए पूरा एक महीना मिल जाता था। मैं लाल गेंद से अभ्यास कर सकता था, अपनी तकनीक पर काम कर सकता था। आज ऐसा शायद ही हो पाता है।”

गिल उन खिलाड़ियों में हैं जिन्होंने हाल के समय में तीनों फॉर्मेट खेले हैं। द्रविड़ के मुताबिक, इसलिए उन्होंने यह दबाव खुद महसूस किया है।

टी20 में भारत क्यों उड़ रहा है?

एक दिलचस्प विरोधाभास भी है।
जहां टेस्ट क्रिकेट में भारत जूझ रहा है, वहीं टी20 में वह एक महाशक्ति बना हुआ है।

इस वक्त भारत न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पांच मैचों की टी20 सीरीज में 3-0 से आगे है और आने वाले टी20 वर्ल्ड कप में खिताब बचाने का प्रबल दावेदार माना जा रहा है।

द्रविड़ इसके पीछे की वजह भी साफ बताते हैं।

“आज सफेद गेंद की क्रिकेट में जो हिटिंग आप देख रहे हैं, वह इसलिए है क्योंकि खिलाड़ी इसका बहुत ज्यादा अभ्यास कर रहे हैं। कई लड़के आईपीएल में ढाई महीने बिताते हैं, जहां रोज़ यही सोचा जाता है कि कितने छक्के मारे जा सकते हैं।”

मतलब साफ है—
जिस फॉर्मेट का अभ्यास ज्यादा, उसी में निखार ज्यादा।

आईपीएल बनाम लाल गेंद: टकराव या संतुलन?

यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा।

पहलूटी20 क्रिकेटटेस्ट क्रिकेट
अभ्यास का समयबहुत ज्यादाबेहद सीमित
स्किल फोकसहिटिंग, पावरतकनीक, धैर्य
मैच टेम्पोतेजलंबा
तैयारी की मांगकमबहुत ज्यादा

द्रविड़ का कहना यह नहीं है कि टी20 या आईपीएल गलत है।
उनका इशारा संतुलन की कमी की ओर है।

डब्ल्यूटीसी और ‘नतीजा दिलाने वाली’ पिचें

भारत की टेस्ट मुश्किलों के पीछे द्रविड़ ने एक और अहम कारण गिनाया—वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC)।

इस समय भारत WTC तालिका में छठे स्थान पर है। 2027 के फाइनल में पहुंचने के लिए उन्हें बड़े सुधार की जरूरत है।

द्रविड़ के मुताबिक, WTC ने घरेलू टीमों पर हर टेस्ट मैच जीतने का दबाव बढ़ा दिया है।

“पहले आपको सिर्फ सीरीज जीतनी होती थी। अब हर मैच मायने रखता है। इसी वजह से दुनिया भर में ऐसी पिचें बन रही हैं, जो गेंदबाजों के लिए बहुत ज्यादा मददगार होती हैं।”

और यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं है।
इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ्रीका—हर जगह यही ट्रेंड दिख रहा है।

क्या भारत को स्पेशलाइजेशन की ओर लौटना चाहिए?

द्रविड़ ने सीधे यह नहीं कहा, लेकिन संकेत साफ हैं।

हर खिलाड़ी तीनों फॉर्मेट खेले—
यह विचार अब हर हाल में काम नहीं कर रहा।

हो सकता है आने वाले समय में:

  • कुछ बल्लेबाज़ टेस्ट-फोकस्ड हों
  • कुछ पूरी तरह व्हाइट-बॉल स्पेशलिस्ट
  • और कुछ ही खिलाड़ी तीनों फॉर्मेट में खेलें

टेस्ट क्रिकेट को वक्त चाहिए

टेस्ट क्रिकेट को बचाने के लिए सिर्फ रोमांटिक बातें काफी नहीं।
उसे समय चाहिए।
खिलाड़ियों को।
कोचों को।
और शेड्यूल बनाने वालों को।

राहुल द्रविड़ की बातों का सार यही है—

अगर लाल गेंद को कैलेंडर में जगह नहीं मिलेगी,
तो वह स्कोरकार्ड में भी जगह खो देगी।

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