Test – संजय मांजरेकर जब बोलते हैं, तो बात सिर्फ राय तक सीमित नहीं रहती—वो बहस छेड़ देती है। और इस बार निशाने पर हैं विराट कोहली। भारत के सबसे बड़े आधुनिक क्रिकेट आइकन को लेकर मांजरेकर ने ऐसी टिप्पणी कर दी है, जिसने टेस्ट क्रिकेट के भविष्य, रिटायरमेंट के फैसलों और खिलाड़ियों की प्राथमिकताओं पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।
उनका सीधा आरोप है—
विराट कोहली ने टेस्ट क्रिकेट की समस्याओं से लड़ने के बजाय उससे दूरी बना ली।
“कमियों पर काम करने के बजाय टेस्ट से भाग गए” – मांजरेकर
संजय मांजरेकर ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर जो लिखा, वह काफी तीखा था। उन्होंने कहा कि जिस तरह जो रूट टेस्ट क्रिकेट में नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, उसी वक्त उनका ध्यान विराट कोहली पर जाता है—जो इस फॉर्मेट को छोड़ चुके हैं।
मांजरेकर के शब्दों में,
“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विराट कोहली ने अपने टेस्ट करियर के आखिरी पांच संघर्षपूर्ण वर्षों में यह जानने की पूरी कोशिश नहीं की कि वह 31 की औसत से रन क्यों बना रहे थे। इसके बजाय उन्होंने टेस्ट क्रिकेट से ही किनारा कर लिया।”
यह बयान सिर्फ आंकड़ों पर नहीं, मेंटैलिटी पर सवाल खड़ा करता है।
10,000 टेस्ट रन से सिर्फ 770 दूर थे कोहली
सबसे चौंकाने वाली बात यही है।
विराट कोहली टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन पूरे करने से महज 770 रन दूर थे। एक ऐसा माइलस्टोन, जो इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता।
लेकिन 37 साल की उम्र में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया।
ऑस्ट्रेलिया दौरे पर उनका संघर्ष साफ नजर आया था।
10 पारियों में सिर्फ 194 रन।
हां, पर्थ टेस्ट में शतक आया—लेकिन उसके अलावा रन नहीं निकले।
यहीं से बहस शुरू होती है—
क्या यह सिर्फ फॉर्म का दौर था, या कोहली सच में टेस्ट की चुनौती से थक चुके थे?
जो रूट, स्मिथ और केन विलियम्सन: तुलना चुभती है
मांजरेकर की बात इसलिए और ज्यादा चुभती है, क्योंकि वह विराट कोहली की तुलना उन्हीं के समकालीनों से करते हैं।
- जो रूट – टेस्ट में करियर का सर्वश्रेष्ठ दौर
- स्टीव स्मिथ – एशेज में फिर से रन मशीन
- केन विलियम्सन – चोटों के बावजूद क्लास बरकरार
तीनों खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट में अपनी विरासत और मजबूत कर रहे हैं।
ODI को चुना, टेस्ट छोड़ा – यहीं मांजरेकर को सबसे ज़्यादा आपत्ति
संजय मांजरेकर की असली निराशा यहां से शुरू होती है।
उन्होंने साफ कहा,
“अगर विराट कोहली हर तरह के क्रिकेट से दूर हो जाते, तो बात समझ आती। लेकिन उन्होंने वनडे क्रिकेट खेलना चुना—और यही मुझे सबसे ज्यादा निराश करता है।”
उनका तर्क सीधा है—
एक टॉप ऑर्डर बल्लेबाज़ के लिए ODI सबसे आसान फॉर्मेट होता है।
- दो नई गेंद
- फील्डिंग पावरप्ले
- बल्लेबाज़ों के पक्ष में नियम
मांजरेकर पहले भी कह चुके हैं कि टेस्ट क्रिकेट असली परीक्षा है। और उसी परीक्षा से दूरी बनाना उन्हें खटकता है।
ODI में रन बरसा रहे हैं कोहली, बहस और तेज
विडंबना देखिए—
टेस्ट छोड़ने के बाद विराट कोहली ODI क्रिकेट में जबरदस्त फॉर्म में हैं।
शतक, बड़े स्कोर, मैच जिताने वाली पारियां—सब कुछ।
यही वजह है कि अब सवाल और तेज हो गया है—
अगर यह फॉर्म टेस्ट में दिखाई जाती, तो क्या कहानी अलग होती?
क्या टेस्ट रिटायरमेंट में जल्दबाज़ी हुई?
यह सवाल अब सिर्फ मांजरेकर नहीं, कई पूर्व क्रिकेटर और फैंस पूछ रहे हैं।
- क्या कोहली को थोड़ा और वक्त देना चाहिए था?
- क्या तकनीकी समस्याओं पर काम किया जा सकता था?
- क्या टेस्ट क्रिकेट ने उन्हें मानसिक रूप से थका दिया था?
विराट कोहली का पक्ष: अब तक खामोशी
अब तक विराट कोहली ने इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
वह मैदान पर जवाब देने में यकीन रखते हैं, माइक्रोफोन पर नहीं।
लेकिन मांजरेकर की यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि यह सिर्फ आलोचना नहीं, एक पीढ़ी के टेस्ट क्रिकेट को लेकर बदलते नजरिए को उजागर करती है।
सवाल विराट पर नहीं, टेस्ट क्रिकेट पर है
संजय मांजरेकर की बातों से चाहे आप सहमत हों या नहीं, लेकिन एक बात साफ है—
यह बहस विराट कोहली से बड़ी है।
यह टेस्ट क्रिकेट की उस लड़ाई की कहानी है, जहां
- एक तरफ चुनौती है
- दूसरी तरफ आराम और रनों की गारंटी
विराट कोहली ने अपना रास्ता चुना है।
इतिहास तय करेगा कि वह रास्ता सही था या नहीं।
लेकिन टेस्ट क्रिकेट के चाहने वालों के मन में यह टीस शायद हमेशा रहेगी—
क्योंकि कुछ अधूरा छूट गया।















