BCCI – जनवरी 2017 में जिस दरवाज़े को सुप्रीम कोर्ट ने सख़्ती से बंद किया था, वही दरवाज़ा अब लगभग नौ साल बाद फिर से खुल गया है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को गुरुवार को शीर्ष अदालत से बड़ी राहत मिली, जब कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में संशोधन करते हुए उन्हें बीसीसीआई से जुड़े मामलों में दोबारा भाग लेने की अनुमति दे दी।
यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की वापसी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि भारतीय क्रिकेट प्रशासन में “आजीवन प्रतिबंध” जैसे शब्दों को अदालत किस तरह देखती है—खासतौर पर तब, जब वक्त बीत चुका हो और परिस्थितियां बदल चुकी हों।
क्या था 2017 का आदेश?
2 जनवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष पद से हटाते हुए निर्देश दिया था कि वे बोर्ड के कामकाज से पूरी तरह अलग रहें। यह आदेश उस समय आया था, जब बीसीसीआई में सुधारों को लेकर कोर्ट और बोर्ड के बीच तीखी खींचतान चल रही थी।
ठाकुर पर आरोप था कि उन्होंने बीसीसीआई की स्वायत्तता के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के तत्कालीन अध्यक्ष शशांक मनोहर को लिखे गए पत्र को लेकर अदालत में झूठा हलफनामा दाखिल किया। इसी आधार पर उनके खिलाफ अवमानना और झूठी गवाही की कार्यवाही भी शुरू हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या कहा?
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने गुरुवार को 2017 के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि अदालत का इरादा किसी व्यक्ति पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का कभी नहीं था।
पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि इस मामले में “आनुपातिकता के सिद्धांत” को लागू करना जरूरी है।
कोर्ट के मुताबिक,
“यह मानने का कोई कारण नहीं है कि अदालत का आशय आजीवन प्रतिबंध लगाने का था। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इतना कठोर प्रतिबंध न तो आवश्यक था और न ही उचित।”
इस फैसले के साथ ही ठाकुर के लिए बीसीसीआई से दोबारा जुड़ने का रास्ता साफ हो गया है, बशर्ते वह बोर्ड के नियमों और विनियमों के तहत काम करें।
नौ साल की दूरी बनी अहम वजह
कोर्ट ने इस बात को भी खास महत्व दिया कि अनुराग ठाकुर नौ साल से अधिक समय तक बीसीसीआई के कामकाज से पूरी तरह अलग रहे। इसके अलावा, अदालत ने यह भी नोट किया कि ठाकुर ने पहले व्यक्तिगत रूप से बिना शर्त माफी मांगी थी।
ठाकुर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया ने दलील दी कि किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक प्रतिबंधित रखना न तो न्यायसंगत है और न ही संवैधानिक।
उनका कहना था,
“सब कुछ मेरे मुवक्किल पर इसलिए आ पड़ा क्योंकि वह उस समय बीसीसीआई के अध्यक्ष थे। यह आदेश हमेशा के लिए नहीं चल सकता।”
अवमानना केस पहले ही हो चुका था खत्म
यह भी याद रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई 2017 को ठाकुर के खिलाफ अवमानना और झूठी गवाही की कार्यवाही पहले ही समाप्त कर दी थी। यह राहत उन्हें बिना शर्त माफी मांगने के बाद मिली थी।
यही नहीं, इसी पूरे प्रकरण के दौरान कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी, जिसने बीसीसीआई के लिए नया संविधान और कई बड़े सुधार सुझाए थे। कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए भारतीय क्रिकेट प्रशासन की संरचना ही बदल दी थी।
अब आगे क्या?
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि अनुराग ठाकुर सीधे किसी पद पर लौट आएंगे। लेकिन अब वे बीसीसीआई से जुड़े मामलों में कानूनी रूप से भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
यह फैसला उन सभी पूर्व प्रशासकों के लिए भी एक संकेत है, जिन पर कभी कड़े प्रतिबंध लगे थे—कि न्यायिक आदेश स्थायी सज़ा नहीं होते, अगर समय, आचरण और परिस्थितियां बदल जाएं।
फैसले का बड़ा असर
| पहलू | असर |
|---|---|
| अनुराग ठाकुर | बीसीसीआई से दोबारा जुड़ने का रास्ता साफ |
| बीसीसीआई | पूर्व अध्यक्ष की संभावित वापसी |
| न्यायिक दृष्टिकोण | आजीवन प्रतिबंध से दूरी |
| क्रिकेट प्रशासन | सुधारों के बाद नया संतुलन |
बड़ी तस्वीर
यह मामला सिर्फ अनुराग ठाकुर तक सीमित नहीं है। यह भारतीय खेल प्रशासन में सत्ता, जवाबदेही और सुधार के बीच के संतुलन को भी दर्शाता है।
एक दौर था जब बीसीसीआई पर कोर्ट का सीधा शिकंजा था। अब वही कोर्ट कह रही है कि सुधार के नाम पर किसी को हमेशा के लिए हाशिये पर नहीं रखा जा सकता।















