BCCI – क्रिकेट की दुनिया में हम अक्सर रिकॉर्ड्स, विकेट्स और शॉट्स की बात करते हैं… लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो स्कोरबोर्ड के बाहर चलती हैं—और ज्यादा भारी होती हैं। लक्ष्मण शिवरामकृष्णन की कहानी उन्हीं में से एक है।
एक समय भारत के सबसे promising लेग-स्पिनर… और फिर अचानक गिरावट, आरोप, अकेलापन—और अब रंगभेद के आरोप के साथ कमेंट्री पैनल से बाहर निकलना। ये सिर्फ एक करियर की कहानी नहीं, एक इंसान की लंबी लड़ाई है।
17 साल का स्टार—और अचानक spotlight
1980 के दशक की शुरुआत…
• उम्र—सिर्फ 17 साल
• skill—leg spin, googly, top spin
• impact—international level पर तुरंत पहचान
शिवरामकृष्णन, जिन्हें “शिवा” कहा जाता था, उस दौर में भारत के future match-winner माने जा रहे थे।
| फॉर्मेट | मैच |
|---|---|
| टेस्ट | 9 |
| वनडे | 16 |
करियर लंबा नहीं चला, लेकिन शुरुआत explosive थी।
टीनएज में ‘शराबी’ का टैग—कहानी यहीं से बदली
शिवरामकृष्णन ने जो सबसे shocking बात बताई—वो ये कि:
19 साल की उम्र में उन्हें “शराबी” और “ड्रग एडिक्ट” कहा गया
उन्होंने साफ कहा:
“मैं 16–19 साल की उम्र में टूर कर रहा था… मुझे होटल में शराब कैसे सर्व होती?”
ये सिर्फ अफवाह नहीं थी—ये label था, जो उनके साथ चिपक गया।
और क्रिकेट में reputation एक बार खराब हो जाए… तो वापसी मुश्किल हो जाती है।
शादी तक पर असर—सोचिए कितना गहरा दाग
उनकी बात का सबसे दर्दनाक हिस्सा शायद यही था।
• माता-पिता ने शादी का विज्ञापन दिया
• टेस्ट क्रिकेटर, फ्लैट ओनर—सब mention किया
• 2 हफ्ते बाद—एक भी जवाब नहीं
इसका मतलब?
लोगों ने उनकी image इतनी खराब मान ली थी कि कोई रिश्ता नहीं आया
ये cricket failure नहीं… social rejection था।
टीम से बाहर—और टूटता हुआ मन
1987 वर्ल्ड कप के बाद जो हुआ, उसने उन्हें अंदर से तोड़ दिया।
• selectors ने कहा—“आप खुद को unfit बताओ”
• उन्होंने मना कर दिया
और फिर…
drop कर दिए गए
ये सिर्फ selection नहीं था—ये self-respect vs system की लड़ाई थी।
डिप्रेशन—जिसके बारे में तब कोई बात नहीं करता था
आज mental health पर बात होती है… लेकिन उस समय?
Almost silence।
शिवरामकृष्णन ने जो बताया, वो disturbing है:
• आईने में खुद को देखना बंद
• रोज पीना और सो जाना
• उठने पर मरने जैसा एहसास
और सबसे खतरनाक—
आत्महत्या के विचार
उन्होंने बताया कि एक बार चलते कार से कूदने का भी ख्याल आया।
ये उस दौर का सच है—जहां खिलाड़ी अकेले लड़ते थे।
मतिभ्रम—मानसिक स्थिति का सबसे डरावना चरण
उन्होंने hallucinations का भी जिक्र किया:
• आंख बंद करते ही डरावनी तस्वीरें
• नींद गायब
• शरीर थका हुआ, दिमाग उलझा
और बाहर की दुनिया?
“देखो, हमने कहा था—शराब वजह है”
यानी blame… empathy नहीं।
कमेंट्री—नई पहचान, नई शुरुआत
क्रिकेट करियर भले छोटा रहा, लेकिन उन्होंने खुद को reinvent किया।
• साल 2000 से कमेंट्री
• sharp analysis
• unique voice
उन्होंने एक नई identity बनाई—microphone के पीछे।
फिर विवाद—और रंगभेद का आरोप
हाल ही में उन्होंने BCCI commentary panel छोड़ दिया।
कारण?
• मौके कम मिलना
• on-field roles में नजरअंदाज होना
जब एक यूजर ने पूछा—क्या skin color issue है?
उन्होंने जवाब दिया:
“आप सही हैं—रंगभेद।”
यह बयान हल्का नहीं है—ये system पर सीधा आरोप है।
Bigger Picture—सिस्टम vs इंसान
शिवरामकृष्णन की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं—
ये दिखाती है:
• कैसे अफवाहें करियर खत्म कर सकती हैं
• कैसे mental health ignore होती है
• कैसे system कभी-कभी protect नहीं करता
और अब—
• representation और fairness पर भी सवाल
















IPL : क्या खत्म हो रहे हैं ऑलराउंडर – Impact Player rule पर बड़ा सवाल