Ishan – चेन्नई में खेला जा रहा दलीप ट्रॉफी का फाइनल मुकाबला लगातार बड़े रिकॉर्ड और शानदार पारियों के कारण खास बनता जा रहा है। टूर्नामेंट में वैभव सूर्यवंशी के नाम का क्रेज रहा, लेकिन फाइनल में कई और खिलाड़ियों ने भी अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। कुमार कुशाग्र ने शतक लगाया, जबकि शिखर मोहन ने 85 रन की बेहतरीन पारी खेली।
हालांकि, इन सभी प्रदर्शनों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पूर्वी क्षेत्र के कप्तान ईशान किशन की हो रही है। किशन ने दक्षिण क्षेत्र के मजबूत गेंदबाजी आक्रमण के सामने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 270 रन की ऐतिहासिक पारी खेली।
ईशान की इस पारी ने उन्हें दलीप ट्रॉफी फाइनल में सबसे बड़ी पारियां खेलने वाले बल्लेबाजों की सूची में पहुंचा दिया, लेकिन वह करीब चार दशक से कायम एक बड़े रिकॉर्ड को नहीं तोड़ सके।
ईशान किशन ने दक्षिण क्षेत्र के गेंदबाजों को किया परेशान
दक्षिण क्षेत्र की टीम में कई अनुभवी और प्रतिभाशाली गेंदबाज मौजूद थे। इसके बावजूद ईशान किशन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ बल्लेबाजी की और लंबे समय तक क्रीज पर टिके रहे।
उनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता के साथ-साथ धैर्य भी नजर आया। शरीर ने जब उन्हें आराम करने के लिए मजबूर किया और वह रिटायर्ड हर्ट हुए, तब भी उनकी टीम को उनकी जरूरत थी।
ईशान बाद में दोबारा बल्लेबाजी करने उतरे और अपनी पारी को 270 रन तक ले गए।
111 रन से आगे खेलकर दोहरा शतक और फिर 270 रन
सोमवार को चेपॉक में ईशान किशन ने 111 रन से अपनी पारी को आगे बढ़ाया। देखते ही देखते उन्होंने फाइनल में अपना पहला दोहरा शतक पूरा कर लिया।
इसके बाद भी वह नहीं रुके और आखिरकार 270 रन बनाकर आउट हुए।
उनकी यह पारी आधुनिक दलीप ट्रॉफी के फाइनल की सबसे यादगार पारियों में शामिल हो गई है।
यशस्वी जायसवाल को पीछे छोड़ा
ईशान किशन ने अपनी 270 रन की पारी के दौरान यशस्वी जायसवाल के 266 रन के स्कोर को पीछे छोड़ दिया।
इस तरह ईशान दलीप ट्रॉफी फाइनल में दूसरा सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर बनाने वाले बल्लेबाज बन गए। हालांकि, वह दलीप ट्रॉफी के इतिहास में सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी के रिकॉर्ड से काफी पीछे रह गए।
दलीप ट्रॉफी फाइनल में बड़ी पारियां
| खिलाड़ी | रन | वर्ष |
|---|---|---|
| रमन लांबा | 320 | 1987 |
| ईशान किशन | 270 | 2026 |
| यशस्वी जायसवाल | 266 | — |
ईशान की 270 रन की पारी के बाद अब दलीप ट्रॉफी में एक बार फिर उस बल्लेबाज का नाम चर्चा में आ गया है, जिसने करीब चार दशक पहले ऐसा रिकॉर्ड बनाया था जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ सका।
रमन लांबा की 320 रन की पारी आज भी सबसे ऊपर
साल 1987 के दलीप ट्रॉफी फाइनल में रमन लांबा ने ऐसी पारी खेली थी, जो आज भी प्रतियोगिता के इतिहास में सबसे ऊपर है।
उन्होंने 320 रन बनाए थे। इस पारी की बदौलत नॉर्थ जोन ने पहली पारी में 868 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया था।
यह दलीप ट्रॉफी के इतिहास में 800 से ज्यादा रन बनाने वाली इकलौती टीम पारी बताई जाती है।
लांबा ने उस मुकाबले में करीब 720 मिनट तक बल्लेबाजी की और 471 गेंदों का सामना किया। उनकी पारी में 30 चौके और छह छक्के शामिल थे।
मैच ड्रॉ रहा, लेकिन पहली पारी में मिली बढ़त के आधार पर नॉर्थ जोन ने खिताब अपने नाम कर लिया।
रमन लांबा की पारी के सामने क्यों फीकी पड़ गईं बाकी पारियां?
रमन लांबा की 320 रन की पारी सिर्फ स्कोर के लिहाज से बड़ी नहीं थी, बल्कि मैच पर उसके प्रभाव के कारण भी ऐतिहासिक रही।
जब वह 320 रन बनाकर आउट हुए, तब तक नॉर्थ जोन 868 रन बना चुका था। दलीप ट्रॉफी के फाइनल में 270 रन की ईशान किशन की पारी शानदार होने के बावजूद वह लांबा के रिकॉर्ड से अभी भी 50 रन पीछे है।
यही वजह है कि ईशान की पारी के बाद एक बार फिर 1987 के उस ऐतिहासिक फाइनल की चर्चा शुरू हो गई है।
आकाश चोपड़ा ने सुनाया रमन लांबा से जुड़ा दिलचस्प किस्सा
पूर्व भारतीय क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने रमन लांबा के बारे में एक दिलचस्प किस्सा साझा किया है।
उन्होंने बताया कि लांबा ने एक बार दलीप ट्रॉफी के मैच में तिहरा शतक बनाया था। आउट होने के बाद वह इतने निराश हुए कि उन्होंने ड्रेसिंग रूम का शीशा तक तोड़ दिया था।
आकाश चोपड़ा के मुताबिक, वर्षों बाद जब उन्होंने लांबा से तिहरा शतक बनाने के बाद उनकी प्रतिक्रिया के बारे में पूछा तो एक और दिलचस्प बात सामने आई।
लांबा को इस बात का अफसोस था कि वह 400 रन बनाने का मौका गंवा बैठे। उनका मानना था कि अगर वह चौहरा शतक बना लेते तो इससे उनके करियर में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता था।
लांबा की बल्लेबाजी को लेकर यह किस्सा उनकी रनों के प्रति भूख और बेहद आक्रामक प्रतिस्पर्धी मानसिकता को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शुरुआत शानदार, लेकिन करियर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा
रमन लांबा ने 1986 में इंग्लैंड दौरे से बिना कोई अंतरराष्ट्रीय मुकाबला खेले वापसी की थी। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जयपुर में उन्होंने अपना पहला वनडे खेला और 53 गेंदों पर 64 रन बनाए।
इसी छह मैचों की सीरीज में उन्होंने दिल्ली में 74 रन और राजकोट में 102 रन की पारी खेली।
पूरी सीरीज में लांबा ने 55.60 की औसत से 278 रन बनाए और भारत की 3-2 से सीरीज जीत में उन्हें प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया।
उनकी शुरुआत देखकर एक लंबे और सफल अंतरराष्ट्रीय करियर की उम्मीद जगी थी।
घरेलू क्रिकेट में शानदार रिकॉर्ड के बावजूद नहीं मिला लंबा अंतरराष्ट्रीय करियर
रमन लांबा ने भारत के लिए सिर्फ चार टेस्ट और 32 वनडे खेले।
टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 102 रन बनाए, जबकि वनडे में उनके नाम 783 रन रहे। भारत के लिए उनका आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच 1989 में आया।
इसके उलट घरेलू प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड बेहद शानदार था।
लांबा ने अपने प्रथम श्रेणी करियर में 53.84 की औसत से 8,776 रन बनाए, जिसमें 31 शतक शामिल थे।
रमन लांबा का क्रिकेट करियर
| प्रारूप | मैच | रन |
|---|---|---|
| टेस्ट | 4 | 102 |
| वनडे | 32 | 783 |
| प्रथम श्रेणी | — | 8,776 |
| प्रथम श्रेणी औसत | — | 53.84 |
| प्रथम श्रेणी शतक | — | 31 |
ईशान किशन की 270 रन की पारी ने फिर जिंदा किया पुराना रिकॉर्ड
ईशान किशन की 270 रन की पारी को आधुनिक दलीप ट्रॉफी फाइनल की महान पारियों में गिना जाएगा। उन्होंने न सिर्फ दक्षिण क्षेत्र के गेंदबाजों के खिलाफ शानदार बल्लेबाजी की, बल्कि यशस्वी जायसवाल के 266 रन के स्कोर को भी पीछे छोड़ दिया।
लेकिन उनकी इस पारी ने साथ ही 1987 के रमन लांबा के 320 रन के रिकॉर्ड को भी फिर से चर्चा में ला दिया।
ईशान 270 रन तक पहुंचे, लेकिन लांबा के रिकॉर्ड से 50 रन दूर रह गए। यानी करीब चार दशक बाद भी रमन लांबा की वह ऐतिहासिक पारी दलीप ट्रॉफी के इतिहास में अपनी जगह मजबूती से बनाए हुए है।
ईशान किशन के लिए 270 रन क्यों महत्वपूर्ण हैं?
ईशान के लिए यह पारी सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है। यह उनके करियर में आए मुश्किल दौर के बाद उनकी शानदार वापसी का भी संकेत है।
उन्होंने खुद हाल ही में बताया है कि अब वह अपने खेल को लेकर ज्यादा सोचने और खुद पर अनावश्यक दबाव डालने से बचते हैं। उनका ध्यान सिर्फ रन बनाने और टीम के लिए योगदान देने पर है।
दलीप ट्रॉफी फाइनल में 270 रन की पारी उनके इसी बदले हुए माइंडसेट का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।













